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Neeraj Tomer

Abstract Classics Inspirational

4.5  

Neeraj Tomer

Abstract Classics Inspirational

चाहतें

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कई बार अपनों के कुछ कटाक्ष दिल की गहराई को इस कदर झकझोर देते हैं कि जीवन के सरल बहाव में अनुत्तरित प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। इन अनुत्तरित प्रश्नों के यदि उत्तर प्राप्त हो जाएं तो स्वयं के वजूद पर लगे प्रश्नचिन्हों को पूर्णविराम से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।


हमारे समाज में ऐसी चोट महिलाओं को अक्सर लगती रहती है। कुछ को ऐसी चोटों का मलहम मिल जाता है, पर कुछ उस पीड़ा के साथ जीने की आदत डाल लेती हैं। जिन्हें मलहम किसी और से मिलता है, वे बार-बार चोटिल होती हैं। परन्तु जो अपने मलहम का प्रबंध स्वयं करती हैं, उन्हंे उनके अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं उनके वजूद की पहचान के रूप में।
मानव प्रवृत्ति किसी भी सकारात्मक परिवर्तन के प्रति उत्साहित एवं रोमांचित रहने की होती है। इसी कारण लोग किसी भी नई चीज के घर आने पर बहुत प्रफुल्लित भी रहते हैं। परन्तु मैं...... मैं पिछले कुछ समय से किसी भी प्रकार के हर्ष अथवा आनन्द के प्रति तटस्थता महसूस कर रही थी। मानो जीवन में ना कोई उमंग हो, न कोई तरंग हो। ये निराशा एवं तटस्थता इतनी अधिक बढ़ गई थी कि मुझसे जुड़े लोग मेरी निराशा का अहसास करने लगे थे। शायद इसीलिए यह बात अब एक मासूम बच्चे ने भी महसूस कर ली थी। अपनी मासूमियत के वशीभूत हो वह मुझसे पूछ भी बैठा कि आपको किसी भी चीज का उत्साह क्यों नहीं है?


उसका यह प्रश्न मेरे दिल और दिमाग दोनों को चीरता हुआ निकल गया। मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि ऐसा क्या हुआ कि मेरी यह खूबसूरत रंगीन दुनिया अचानक से इतनी बदरंग हो गई!!!
सोच के गहरे सागर में डूबी जिं़दगी के पन्ने पलटते हुए, कुछ पन्नों में मैंने स्वयं को मात्र भागते हुए पाया। मैं भाग रही थी कभी अपनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने के लिए, तो कभी सामाजिक एवं नौकरी के दायित्वों को निभाने के लिए। ‘कर्तव्यपरायणता’ के कीडे़ ने अरमानों की देह को खोखला ही नहीं किया, बल्कि पूर्ण रूप से खा लिया था। इन पन्नों में यह भी देखा कि किस प्रकार अपनी चाहतों की निर्मम हत्या मैं स्वयं करती जा रही थी! अपनी पसंद-नापसंद के प्रति बेपरवाह हो, मैं पूर्ण रूप से समर्पित एवं आश्रित हो गई थी उन लोगों की पसंद-नापसंद पर जिनसे मैं अथाह प्रेम करती हूँ। मेरे ‘अपने’ चाहे वे परिवार से संबंधित हो, कार्यस्थल से हो या समाज से। उनकी पसंद से स्वयं को अनमनेपन से आनंदित कर रही थी। शनैः शनैः मेरी अपनी पसंद मसलन मुझे क्या खाना पसंद है, क्या पहनना पसंद है, कहाँ घूमना पसंद है, किससे मिलना पसंद है, कौन-सा संगीत पसंद है, कब आराम करना है, कब सोना है, कब उठना है, अपने लिए कुछ लेना है, और ऐसी न जाने क्या-क्या ख्वाहिशें सबके विषय में सोचना भी कहीं छूट गया। जैसे कोई रोबोट हो। मात्र कार्यसिद्धि हेतु क्रय किया गया हो। निश्चित रूप से यदि ज़्यादा पन्नों पलटे जाऐं तो इन इच्छाओं के छूटने का क्रम भी मिल जाएगा। परन्तु विस्मय तो मुझे इस बात का होता है कि स्वयं को इस प्रकार भूलने का यह सिलसिला एक धीमे ज़हर की तरह जीवन में घुलता जा रहा था और इसका मुझे इल़्म भी न हुआ।


क्या ये सिर्फ़ ‘मैं’ हूँ? या मेरी सोच की अतिशयोक्ति है? नहीं! हर वो औरत, जिसने जिम्मेदारियों का बोझ आपनी साँसों पर रख दिया, वह इसी घुटन से गुजर रही है। उसकी साँसें स्वयं के अतिरिक्त सभी की फ़रमाइशों एवं पसंद-नापसंद के साथ-साथ अनुमतियों की मोहताज हैं। वह अपने लिए सोचना छोड़ चुकी है। बस सम्पूर्ण दिन फिक्रमंद रहती है दूसरों के लिए। उसको पता होता है कि बच्चों को खाने में क्या पसंद है, पर अनभिज्ञ है कि उसे आज क्या खाने का मन है! अपनी पसंदीदा लाल साड़ी पहनकर वह शीशे के सामने खड़ी ही होती है कि पति टोक देता है कि भड़काऊ लग रही हो। कोई हल्का रंग पहनो। और वो बिना एक क्षण गवाएँ बदल देती है अपनी पसंद। मैंने अक्सर महिलाओं को कहते सुना है कि मैं फलां काम इसलिए नहीं करती, क्योंकि बच्चों के पापा को पसंद नहीं है। विचित्र-सी बात है कि काम महिला को करना है, पर पसंद पति की होगी। सहेली कहती है कि बहुत दिन हो गए, आजा मिल ले। घर की जिम्मेदार औरत कहती है कि क्या करूँ मन तो बहुत है पर इन्हें (पति को) यूं मेरा कहीं आना-जाना ज्यादा पसंद नहीं है। चल कोई नहीं फोन पर तो बात हो ही जाती है। ये ‘सब्र’ है, समझौता है, आत्मनियंत्रण है या वजूद का दमन है? और फिर ये तीख तंज- तुम्हें किसी बात का कोई उत्साह नहीं है क्या?


क्यों नहीं है? बिलकुल है। जो आज़ादी, जो स्वछंदता सभी के पास है अतिरिक्त घर की महिलाओं के, प्यारी तो उन्हें भी बहुत है। ‘चाहते’ उनकी भी हैं चूल्हे-चौके की दुनिया से निकलकर अपने सपनों की दुनिया के आसमान में उड़ने की। पर ये उनके पास है कहाँ? जब ये प्रश्न पूछा जाता है तो मूँछों पर ताँव के साथ जवाब आता है कि हमने रोका कब है? ‘सत्य वचन’। रोका किसी ने नहीं, पर ये कहा भी तो किसी ने नहीं कि तुम जाओ, घर आज मैं देख लूंगा। ये भी तो नहीं कहा कि आज तुम क्या खाओगी, मैं तुम्हारी पसंद का खाना बना दूंगा। ये भी तो नहीं कहा कि तुम आराम कर लो बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा। ये भी तो नहीं कहा कि ये जो मैं करूंगा ये मेरा भी काम है, तुम पर कोई अहसान नहीं है। ये भी तो नहीं कहा कि ये मैं अब रोज़ अपनी जिम्मेदारी मानकर उसी तरह करूंगा जिस तरह तुम संभालकर सबकुछ, मुझे फ्री कर देती हो। किसी ने ये भी तो नहीं कहा कि तुम अपनी ‘चाहते’ मुझे भी तो बताओ। मैं उन्हें पूरा करने में हर कदम तुम्हारा साथ दूंगा।


बहुत साहस की आवश्यकता होती है ये सब कहने के लिए। सबकी जिम्मेदारी लेते समय एक औरत सबकी गुनहगार होने का बीड़ा भी उठाती है। सुबह दिन आरंभ होते ही ‘तुमने ये नहीं किया, ये देखो तुमने क्या किया, तुम ध्यान क्यों नहीं देती हो, तुम सारा दिन क्या करती हो’? उफ्फ्फ्.......... थक जाती हैं महिलाएँ यह सब सुन-सुनकर। पर थकते नहीं लोग ये ताने बुन-बुनकर। अब तो लगता है सबको आदत-सी हो गई है इन सब की। दिन इन डायलॉग्स के बिना अधूरा-सा लगता है। एक बार सोचा क्यों न इन डायलॉग्स को बोलने वाले सुख का आनन्द मैं भी लूं। हे ईश्वर! क्षमा करना उस अपराध के लिए मुझे। सदैव स्मरण रहेगा उस दिन का प्रसाद। निःशब्द!!!


बहरहाल यह एक ऐसा अनुत्तरित प्रश्न है, जिसका उत्तर वस्तुतः सभी को ज्ञात है कि ‘औरतों की अपनी चाहतें क्यों नहीं होती?’’








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