Geeta Choubey

Inspirational Others


3.4  

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बेटी को बेटी ही रहने की

बेटी को बेटी ही रहने की

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फोन का रिसीवर रखने के बाद रजनी के मन में अपनी बिटिया रंजीता के आखिरी शब्द बहुत देर तक गूँजते रहे... "बेटी को बेटी ही रहने दो, उसे बेटा मत बनाओ।" रजनी अवाक रह गयी और गहराई से सोचने लगी कि उससे चूक कहाँ हुई। इतना आक्रोश कैसे भर गया उसकी बेटी के मन में। यहाँ तक कि इस आक्रोश का जिम्मेवार भी वह रजनी को ही मान रही थी जिसने पूरे घर और समाज से लड़कर अपनी बेटी को वो हर अधिकार दिलाए जो किसी पुरुष प्रधान घर में सिर्फ लड़कों को ही मिले हुए थे। शायद यहीं वह भूल कर गयी। परंतु वह भी क्या करे। रजनी अपने अतीत के पन्ने पलटने लगी। इस बात का उसे आजीवन मलाल रहा कि सिर्फ लड़की होने की वजह से वह अपने सपने पूरे नहीं कर पायी ।

रजनी चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। बचपन से ही वह हवाई जहाज़ देखकर बहुत रोमांचित हो जाती थी। हवा में जहाज़ को उड़ते देख सोचती रहती कि काश! उसे भी पंख मिल जाते तो वह भी आसमान की सैर कर आती। थोड़ी बड़ी हुई तो उसे पता चला कि यह एक यंत्र है जिसका तकनीकी ज्ञान सीख कर मनुष्य ही उड़ाता है। उसने भी मन में संकल्प लिया कि वह भी इस ज्ञान को सीख कर एक दिन जहाज़ उड़ाएगी। तब उस भोली बालिका को कहाँ पता था कि बड़ी होने पर आसमान तो दूर घर की चौखट से बाहर जाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ेगी। माध्यमिक शिक्षा तक आते-आते उसे यह अच्छी तरह समझा दिया गया कि 'लड़की हो लड़की की तरह रहना सीखो।' जबतक विवाह नहीं हो जाता तब तक समय काटने के लिए पढ़ाई जारी रखनी है। यहाँ तक कि विज्ञान विषय लेकर शिक्षा ग्रहण करने में भी कई अड़चनों का सामना करना पड़ा था। लड़कियों का ट्यूशन जाना अच्छा नहीं माना जाता था। पास-पड़ोस के व्यंग्य-बाण सुन-सुनकर सहज-सुलभ शिक्षा पर ही ध्यान केंद्रित करना पड़ा। 

  "लड़की है, कितना पढ़ेगी?" इस तरह के तीर समय-समय पर समाज द्वारा छोड़े जाते रहते। फिर जल्दी से अंतिम बेटी के हाथ पीले कर गंगा नहाने का लोभ माता-पिता संवरण नहीं कर पाए। 

स्नातक उत्तीर्ण करते ही रजनी को विवाह-बंधन में बांध दिया गया। रजनी का ससुराल तो मायके से भी ज्यादा रूढ़िवादी था। पर खुशी की बात यह थी कि उसके पति उदारवादी विचारों के थे और स्त्रियों का सम्मान करते थे। इसका फायदा रजनी को यह मिला कि उसने नियमित विद्यार्थी की तरह अपनी अधूरी शिक्षा पूर्ण की। हालांकि दो बच्चों के हो जाने के बाद काफी बाधाएं भी आयीं, परंतु पति के सहयोग से सफल होती गयी। 

  दो प्यारे बच्चों को जन्म देने के बाद रजनी ने अपना पूरा ध्यान बच्चों पर केन्द्रित कर लिया और उसी समय यह सोच लिया था कि वह अपने दोनों बच्चों जिसमें एक पुत्र और दूसरी पुत्री थी की एक समान परवरिश करेगी। उसने दोनों बच्चों में कोई भेद नहीं किया। दोनों को समान सुविधाएँ प्रदान की। अपनी तरफ से रजनी ने कोई कसर न छोड़ी थी। बच्चे जो विषय लेकर पढ़ना चाहते थे, उनकी इच्छा को महत्व दिया और संबंधित सभी सुविधाएँ भी उपलब्ध करायी। 

हालांकि उसकी बेटी रंजीता ने विवाह माँ-बाप के सुझाए लड़के से ही की, परंतु इसमें भी रजनी और उसके पति ने अपनी पुत्री के फैसले को ही सर्वोपरि माना। ऐसा नहीं था कि रजनी को समाज के तानों का सामना नहीं करना पड़ा। परंतु वह बड़े दर्प से सबको यह कहकर चुप करा देती कि 'उसकी बेटी उसका बेटा है। ' शायद यही रजनी की भूल थी। जब ईश्वर ने पुरुष और स्त्री की अलग-अलग संरचना कर अलग-अलग शक्तियों से नवाजा है तो उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर उनकी शक्तियों और उनकी प्रतिभा को निखारना अधिक न्यायोचित है।

रंजीता सफलता की सीढ़ियाँ तो चढ़ती गयी, परंतु नारी सुलभ कार्यों में स्वयं को सहज नहीं महसूस कर पाती थी। घरेलू कार्यों में रूचि न रहने के कारण कभी मजबूरीवश करना भी पड़ता तो झुंझला उठती थी अपनी माँ पर। 

फोन पर बातों के दौरान रजनी के यह कहने पर कि 'तुम मेरी बेटी नहीं, बेटा हो...' सिर्फ इतना कहकर फोन रख दिया कि "बेटी को बेटी ही रहने दो, उसे बेटा मत बनाओ।" 

रजनी आत्ममंथन करने पर मजबूर हो गयी कि सचमुच हमें बेटी को बेटी ही रहने देना चाहिए। बेटी को बेटा बनाने की आवश्यकता ही क्यों? 

      


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