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Sudha Adesh

Drama Inspirational Thriller


5.0  

Sudha Adesh

Drama Inspirational Thriller


बदलते समीकरण

बदलते समीकरण

20 mins 898 20 mins 898

‘शहर में नित्य अपराधों के बढ़ते ग्राफ के मद्देनजर सुश्री दिव्या खन्ना की नियुक्ति इस शहर में की जा रही है। वे जहाँ-जहाँ रही है वहाँ उनके रहते अपराधों में भारी कमी आई है। अपराधियों पर सख्ती बरतने के साथ-साथ वह उन्हें सामान्य जिंदगी की ओर प्रेरित करने से भी नहीं चूकी है। इसके साथ ही वह पुलिस फोर्स को भी अपराधियों से जूझने के नये-नये तरीके सीखने की ट्रेनिंग लेने के लिये भी प्रोत्साहित करती रही है। उनकी नियुक्ति की खबर से अपराधियों में अफरा तफरी मच गई है।’


अखबार में छपी खबर पर आकांक्षा की आँखें ठहर गई... तो क्या दिव्या का स्थानांतरण यहाँ हो रहा है? कितने दिनों पश्चात वे सब साथ-साथ रह सकेंगे? खुशी से ओत-प्रोत आकांक्षा ने इस खबर की पुष्टि के लिये दिव्या के मोबाइल पर कान्टेक्ट किया। द मोबाइल यू आर ट्राइंग इज आउट आफ रीचेबिल एरिया, सुनकर लगा कि शायद वह ऐसी जगह हो जहाँ कनेक्टीविटी न मिल पा रही हो। घर फोन किया वहाँ अटेन्डेंट ने बताया कि कहीं बाहर गई है देर रात तक लौटेंगी।


बात न हो पाने पर चिंता तो हो ही जाती है पर उसका कार्य ही ऐसा है। अपराध और अपराधियों के बीच झूलती दिव्या कभी उन्हें स्मरण भी करती होगी, उसे संदेह था। एक बार एक हफ्ते तक उसका फोन नहीं आने पर अपने मन का संशय उसे बताया तो वह बोली थी, ‘ममा, ऐसा क्यों सोचती हो? मेरा जॉब ही ऐसा है, कब कहीं भी कोई घटना होने पर तुरंत जाना पड़ता है, कहीं कनेक्टिविटी मिलती है कहीं नहीं... अतः चिंता न किया करो। इस बार मंत्रीजी के आगमन के कारण अतिव्यस्त रही। कहीं कुछ ऐसा वैसा न हो जाए, इसके लिये व्यापक रूप से तैयारी की गई थी। बस इसी से फोन नहीं कर पाई। क्या अपनों को कोई भूल सकता है? आप तो मेरी हर सांस में बसी हो माँ... आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपके ही कारण हूँ।’


इस बार भी बात न हो पाने के कारण चिंता तो हुई पर कर भी क्या सकती थी...? मन अनायास ही अतीत के गलियारों में विचरण करने लगा... 


नन्हीं दिव्या याद आई... जिसकी हर खुशी को पूरा करते वे फूले नहीं समाते थे। शायद उनके इस अतिशय प्यार और देखभाल ने उसे जिद्दी बना दिया था। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई उसका तुनकना और जिद बढ़ती गई। जिस बेटी को वह सहेली बनकर पालना चाहती थी उसके लिये वह पुराने जमाने की आउटडेटेड माँ बनकर रह गई। उसके स्कूल में कोई फंक्शन होता तो पहले ही पूछ लेती... ‘ममा, कौन सी साड़ी पहन कर आ रही हो...?’


यहाँ तक कि घर में भी वह उसे टोकती रहती, कहती... आप पूरे दिन ऐसे ही घूमती रहती हो। मेरी सहेलियों की मम्मियाँ कितनी टीप-टॉप रहती है!! टी.वी. में आप सीरियल देखती रहती हो... कम से कम उन्हीं से कुछ सीखिये या आप टी.वी. की आँटियों की तरह क्यों ड्रेस नहीं पहनती!! कितनी स्मार्ट रहती है वे...?


टी.वी. सीरियल बच्चों तो क्या बड़ों के सिर पर चढ़कर बोल रहे है पर प्रकट में बोली, ‘बेटा, जो जिंदगी आप टी.वी. में देख रहे हो वह वास्तविक जिंदगी से बहुत दूर है। यह सब मनोरंजन या ग्लैमर की दृष्टि से भले ठीक हो पर वास्तविक जीवन में इसे अपनाया नहीं जा सकता।’


पर दिव्या पर कोई असर नहीं पड़ता था। छुट्टियों में तो उसे टी.वी. देखने के सिवा और कोई काम ही नहीं रहता था। किसने कौन सी ड्रेस पहनी है? उस ड्रेस के साथ कौन सी जुएलरी पहन रखी है या लिपिस्टक का रंग कैसा है... बस यही देखना और सहेलियों से बात करने का मुद्दा रहता था।


एक उनका समय था जब भी छुट्टियाँ होती थी, कुछ न कुछ नया सीखने में जुट जाते थे। चाहे सिलाई हो या डाल मेंकिंग का कोर्स... बेकरी या तरह-तरह की आइसक्रीम बनाने के क्रेश कोर्स। इससे न केवल जानकारी बढ़ती थी वरन् कुछ नया करने का विश्वास भी पैदा होता था। पर अब तो इन सब चीजों से कोई मतलब ही नहीं रहा है। शायद यही कारण है कि बच्चों की क्रियेटिविटी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।  

   

सबसे ज्यादा आक्रोश उसे तब आता जब वह टी.वी. के पात्रों की तरह ड्रेस पहनना चाहती तथा उन्हीं की तरह आचरण करती। स्ट्रेप वाले टॉप जब तक वह छोटी थी तब तक तक तो ठीक लगते थे लेकिन किशोर होती लड़की अगर एक दम फिट कपड़े पहनना चाहे तो अनायास ही दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है... ऐसा उसका मानना था पर वह समझने को तैयार ही नहीं थी।


कालेज में पहुंचते ही उसकी नई-नई डिमांड शुरू हो गई। तरह-तरह की नई ड्रेस, मेचिंग जूते, पर्स इत्यादि खरीदे गये। टू व्हीलर भी अब आवश्यक हो गया क्योंकि साइकिल चलाने में अब उसे शर्म आने लगी थी। टू व्हीलर दिलवाया तो मानो उसके पर ही निकल गये... घर में वह टिकती ही नहीं थी। कुछ कहते तो चिढ़ जाती थी। दुख तो इस बात का था कि अपनी ही बेटी अपने लिये पराई होती चली जा रही थी।


विनय से कहती तो वह कहते, ‘क्यों चिंता करती हो, यह उम्र ही ऐसी है। इस समय शरीर में होते हारमोनल परिवर्तन युवाओं के शरीर के साथ-साथ मानसिक स्थिति में भी परिवर्तन ला देते है इसीलिए बाल्यावस्था और युवावस्था के मध्य के इस काल को संक्रमणकाल भी कहा जाता है। ज्यादा टोका-टोकी करने पर इस उम्र में बच्चों को अपने माता-पिता ही अपने दुश्मन नजर आने लगते है इसीलिए कहा गया है कि इस समय बच्चों को माता-पिता नहीं वरन् मित्र समझकर व्यवहार करना चाहिये।’


‘मैं तो उससे मित्रवत् व्यवहार ही करना चाहती हूँ पर वह कुछ कहे सुने तब न, उसने तो घर को सराय बना रखा है। उसका आने जाने का कोई समय ही निश्चित नहीं है।’ न जाने क्यों वह आवश्यकता से अधिक तिक्त हो चली थी।


‘सब ठीक हो जायेगा, तुम चिंता मत करो।’ कहकर विनय ने टॉपिक बदल दिया था।


पर सब कुछ ठीक कहाँ हो पाया था!! रोज रोज पैसों को लेकर अलग चिक-चिक होने लगी थी। विनय कहते दे दो, आखिर इंसान कमाता किसलिये है? बच्चों के लिये ही न, अगर उनकी इच्छायें पूरी न कर पायें तो इतना कमाने से क्या लाभ?


जबकि आकांक्षा का सोचना था कि बच्चों को पैसे के महत्व का भी पता होना चाहिये। बच्चों को समझाना चाहिए कि पैसा खर्च करना आसान है पर कमाना बेहद मुश्किल अतः उनकी उतनी ही इच्छायें पूरी करनी चाहिए जितनी आवश्यक हों...।


इसी बात पर अक्सर उसकी दिव्या से बहस हो जाती... वह उससे दिये हर पैसे का हिसाब चाहती। नहीं दे पाने पर उसे डाँटती जबकि विनय सोचते बच्चे है, थोड़ा बहुत इधर उधर तो खर्च करेगे ही, उनसे हिसाब माँगकर व्यर्थ ही उन्हें टेंशन में डालना होगा। अपने पापा की शह पाकर वह उसे नजरअंदाज करने लगी थी।  

  

एक दिन शाम को दिव्या तैयार होकर बोली, ‘ममा, आज मेरी दोस्त की बर्थडे है हमें वह होटल में ट्रीट दे रही है, आने में शायद देर हो जाये।’


अब तो लगभग हर दूसरे तीसरे दिन यही कार्यक्रम होने लगा... एक दिन पूछ ही बैठी, ‘ऐसे ही रोज पार्टियाँ होती रही तो पढ़ाई कैसे होगी?’


‘रात में तो पढ़ती ही हूँ।’ लापरवाह स्वर में दिव्या ने उत्तर दिया।


एक ऐसे ही दिन आने में देर होने पर उसने उस मित्र के घर फोन कर उसके बारे में पता करना चाहा तो पता चला कि वह तो काफी पहले निकल चुकी है उस दिन मन बहुत ही अशांत रहा। बाहर बरामदे में बैठी उसका इंतजार कर ही रही थी कि उसकी स्कूटी गेट पर रूकी, साथ ही दूसरे स्कूटर पर कोई लड़का उसे बाय करता हुआ निकल गया।


पूछने पर चिढ़कर बोली, ‘हाँ मेरा दोस्त था।’


समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करे..? कहाँ तो वह उसकी मित्र बनकर उसे पालना चाहती थी पर अब जब भी कुछ भी कहती तो सीधा बोल देती, ‘ममा, आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो!! क्या आपको मुझ पर विश्वास नहीं है?’


‘तुझ पर तो विश्वास तो है बेटा, पर दुनिया वालों पर नहीं है...।’


‘ऐसा वही लोग बोलते है जिन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं होता।’


‘अतिआत्मविश्वास वाले ही धोखा खाते है। हो सकता है जिसे तू अपना मित्र समझ रही है वही तुझे धोखा दे दे।’ आकांक्षा ने उसे समझाना चाहा।


‘ममा, अगर ऐसा है तो किसी को दोस्त ही न बनाया जाये!!’ आश्चर्य चकित मुद्रा में उसने पूछा।


‘मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है बेटा... दोस्त बनाओ पर अच्छी तरह परख कर। खास तौर पर लड़कों के साथ कभी अकेले मत जाओ। कालेज में ऐसी ड्रेस मत पहनकर जाओ जिससे लोग आकर्षित होकर कुछ गलत कार्य करने को प्रेरित हों।’ आकांक्षा ने उसे समझाते हुए पुनः कहा।


‘ममा, आप बार-बार मेरे कपड़ों के बारे में क्यों इंगित करती रहती हो... कालेज में सब लड़कियाँ ही तो ऐसी ही ड्रेस पहनकर आती है।’ किंचित क्रोध से उसने कहा।


‘बेटा, मैं तो तुझे ऊँच-नीच समझा रही थी। स्त्री की दौलत उसका चरित्र ही है... अगर वही नहीं रहा तो मान-सम्मान, धन दौलत सब व्यर्थ है।’   

   

पर वह तो कब की जा चुकी थी। सच एक लड़की की माँ होना काँटों का ताज पहनने के बराबर है... खास तौर से तब, जब लड़की सुंदर हो, नादान हो और जवानी की ओर कदम बढ़ा रही हो। कितनी ही शंकायें, कितने ही संदेह मन को घेरे रहते है। उस पर भी यदि वह लड़की माँ की परेशानी को समझ नहीं पाये। उसे रूढ़िवादी, परम्परावादी इत्यादि अनेक अलंकरणों से युक्त कर सदैव कटघरे में खड़ा कर अपमानित करे तो बेचारी माँ अंतःकवच में सिमटने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है?


परेशानी तो उसे तब होती थी जब वह दिव्या को पढ़ने की बजाय सजने संवरने में ज्यादा ध्यान देते हुए देखती। विनय से कहती तो उनका वही रटा रटाया जबाव होता, ‘तुम व्यर्थ परेशान हो रही हो, यह उम्र ही ऐसी है। कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जायेगा।’ एक दिन वह शापिंग करके लौट रही थी कि देखा दिव्या किसी के साथ बाइक पर बैठी जा रही है।


अपना स्कूटर होते हुए भी भला वह दूसरे के स्कूटर पर कहाँ जा रही है? इस समय तो उसका क्लास होना चाहिए फिर यह बाहर कहाँ घूम रही है...? सोचते हुए उसने आटो वाले से उनका पीछा करने के लिये कहा पर जब तक आटो बैक हुआ वे आँखों से ओझल हो गये। वह मन मारकर घर लौट आई।


उसने उसके कुछ मित्रों के घर फोन किया पर सबने यही कहा कि पता नहीं। हमसे तो उसने कुछ कहा नहीं। अब इंतजार करने के सिवाय कोई चारा भी नहीं था।


विनय भी आफिस से आ गये थे। दिव्या के घर न आने पर वे भी चिंतित हो उठे थे। घड़ी की खिसकती सुइयों के साथ उनकी चिंतायें बढ़ रही थी। रात के दस बज चुके थे। समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें...? बार-बार लड़के साथ बाइक पर जाती दिव्या की तस्वीर आँखों के सामने से घूम जाती। मन अनहोनी की आशंका से काँप उठता। उसकी कोई सूचना न पाकर सोचा जाकर पुलिस में कंम्प्लेंट करें। वे निकलने ही वाले थे कि फोन की घंटी बज उठी... विनय ने फोन उठाया…


‘शायद आप उस लड़की के पिता है जिसे मैंने अभी शिवा नर्सिग होम में भर्ती करवाया है। उसके बैग से प्राप्त मोबाइल से आपका नंबर पाकर फोन कर रहा हूँ। उसकी हालत अच्छी नहीं है। आप शीघ्र आ जाइये...।’ किसी आदमी का स्वर था।


विनय ने तुरंत गाड़ी निकाली तथा शिवा नर्सिग होम की ओर चल पड़े मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे... क्या दिव्या का एक्सीडेंट हो गया है? पता नहीं कितनी चोटें आई होंगी...!! कितनी बार कहा है स्कूटर धीरे चलाया करो पर मानती ही नहीं है। स्कूटी हवा की तरह चलाती है... अगर कुछ कहो तो कहेगी, ‘धीरे ही चलाना है तो साइकिल पर न जाऊँ।’


वास्तव में नई पीढ़ी को समझाना बेहद ही मुश्किल है। वह अपने ही दिमाग से सोचना और करना चाहती है पर इसमें उसका भी क्या दोष...? वह भी तो उसकी उम्र में ऐसा ही सोचा और किया करती थी ।


अस्पताल में घुसते ही सामने से एक आदमी आता मिला, बोला, ‘क्या आप लोग वहीं है जिन्हें मैंने फोन किया था।’


‘हाँ पर उसे हुआ क्या है?’


‘वही जो नहीं होना चाहिये। वह तो इसका भाग्य अच्छा था कि हम उधर से गुजर रहे थे वरना बचती ही नहीं। वह तो अपना काम करके इसका काम तमाम करना चाहता था पर इसकी चीख सुनकर हम पहुँच गये और वह भाग गया? कैसे माँ-बाप है आप जो बच्चों को इतनी छूट दे रखी है। आखिर इसे उस लड़के के साथ उस सुनसान पार्क में जाने की आवश्यकता ही क्या थी...? स्वयं ही गई होगी। कोई जबरदस्ती तो इसे वहाँ कोई ले नहीं गया होगा?’ वितृष्णा से उस आदमी ने कहा। उसके साथ खड़ी औरत के चेहरे पर भी कुछ ऐसे ही भाव थे।


सुनकर आकांक्षा अवाक् रह गई। जिसका उसे सदा से डर रहा था, वही घट कर रहा। आखिर कितना समझाया था कि सब पर विश्वास मत कर पर अपनी ही करके रही। अब भुगतना तो पड़ेगा ही...।


डाक्टर से बात की तो वह बोला, ‘मेंटल शाक की स्टेट में है, रिकवर करने में थोड़ा समय लगेगा अभी नींद का इंजेक्शन देकर सुला दिया है।’


पर आँखे यही बोलती प्रतीत हो रही थी... कैसे माता-पिता है आप जो बच्ची पर नजर नहीं रख पाये...?


आकांक्षा और विनय उसके कमरे में गये। मासूम सूरत पर आँसुओं की लकीरों के साथ तनाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उसकी ऐसी हालत देखकर वे दोनों ही एक दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। आज विनय को उसकी चिंता समझ में आ रही थी पर अब कर भी क्या सकते थे...? पर बार-बार यही प्रश्न मनमस्तिष्क में घूम रहा था... क्या बच्चों पर विश्वास करना गलती करना है?


पर यदि कोई किसी के विश्वास को ही भंग कर दे तो...!! क्या उसी लड़के ने उसके साथ यह कुकर्म किया है जिसके साथ वह स्कूटर पर बैठी जा रही थी...? कितनी खुश नजर आ रही थी वह...? इस तरह का उसे अगर जरा भी अंदेशा होता तो वह क्या उसके साथ जाती...? सच ऐसी घटनायें ऐसे झूठे और मक्कार लोगों के द्वारा होती है जो विश्वासपात्र होने का नाटक कर भोली भाली युवतियों को अपने बुने जाल में फाँस कर ताउम्र तड़पने के लिये छोड़, उनकी बर्बादी पर खुश होकर, अपने पुरूषोचित्त अहंकार में मस्त, स्वयं को सर्वेसर्वा समझते है। 


अभी सोच ही रहे थे कि अखबार और टी.वी. वाले आकर उनसे तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगे...। हम कुछ नहीं जानते... हमें कुछ नहीं कहना, कहकर मीडिया वालों से बचने की कोशिश की पर सुबह अखबार में खबर छप ही गई। यहाँ तक कि टी.वी. में भी समाचार प्रसारित हो गया कि अमुक शहर की लड़की के साथ रेप हुआ है, अभी वह बेहोश है अतः अभी अपराधी का पता नहीं चल पाया है।


मीडिया पर उन्हें क्रोध आ रहा था जो उनकी मुश्किलें और बढ़ा रहा था। क्या इस तरह ढिढ़ोंरा पीट कर पीड़िता को न्याय दिलवाया जा सकता है...? आज न्यायपालिका की जो हालत है, उससे इंसान न्याय पाने से पहले मर जाना ही पसंद करेगा...!! विरक्ति से उसने सोचा था।


दिल पर हथौड़ों के प्रहार हो रहे थे। समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? तभी महिला मुक्ति आंदोलन से जुड़ी महिलायें दिव्या का हाल पूछने आ गई। वह अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाना चाहती थी।


आकांक्षा समझ नहीं पा रही थी कि ये लोग क्या दिव्या को न्याय दिलवा पायेंगी....? अपराधी पकड़ा भी गया तो ज्यादा से ज्यादा उसे पाँच वर्ष, आठ वर्ष की कैद मिल जायेगी पर उसे सजा दिलवाने में पीड़ित लड़की को जो-जो झेलना पड़ेगा, वह क्या मौत से भी बत्तर नहीं होगा? मौत तो केवल एक बार आती है पर यहाँ तो उसे रोज उस हादसे के साथ जीना, मरना होगा!! कौन उसका हाथ थामेगा...? और यदि दया दिखलाते हुए कोई साहस भी कर ले तो क्या गारंटी कि वह उसके छींटें लगे दामन पर और छीटें नहीं उछालेगा...?


उन जैसे मध्यमवर्गीय लोगों को न्याय दिलवाने की इस प्रक्रिया में न जाने कितने वर्ष लग जायें। दिव्या का तो जीवन ही बर्बाद हो जायेगा। नहीं... वह अपनी बच्ची के साथ ऐसा कुछ नहीं होने देगी। एक बार जो हो गया, उसकी आग में उसे और नहीं जलने देगी। एक एक्सीडेंट समझकर वह स्वयं इसे भूल जायेगी तथा दिव्या को भी भूलने देगी। वह उसे इस शहर से कहीं दूर ले जायेगी जहाँ वह नया जीवन शुरू कर सके... इस हादसे को भूल सके।


दिव्या को आँखें खोलते देखकर वह उसके पास गई। वह उसे देखकर रोने लगी, ‘ममा, मैं बहुत बुरी हूँ... मैंने आपकी बात नहीं मानी... उसने मुझे धोखा दिया।’


‘नहीं बेटी, तू तो मेरी बहुत ही प्यारी बच्ची है। जो भी हुआ वह तेरे जीवन का एक हादसा मात्र था... उसे भूल जा। आज से नया जीवन प्रारंभ कर। मैं इस बारे में तुझसे कोई सवाल जबाव नहीं करूँगी। अगर तुझे मर्द जात से बदला लेना है तो तुझे कुछ बनना होगा। अपने पैरों पर खड़े होना होगा। हादसे हर इंसान के जीवन में आते है, कुछ हादसे जीवन को कुछ सीख, नया आयाम दे जाते है पर इंसान वही है जो इन हादसों से सबक लेते हुए आगे बढ़ता जाए न कि कुंठित होकर बैठ जाये। बदला इंसान को क्रूर बनाता है वहीं क्षमा इंसान में आत्मबल पैदा करती है।’


दिव्या उसकी गोद में मुँह छिपाकर रो पड़ी थी। उसके साथ हुए हादसे ने उन सबको हिला कर रख दिया था... जीवन तो हादसों का ही नाम है। अगर जिजीविषा हो, संकटों में भी इंसान टूटे नहीं, निरंतर संघर्ष करता रहे तो सफलता अवश्य ही मिलती है, ऐसा उनका मानना था।


उसकी स्थिति देखकर उसने और विनय ने निर्णय किया कि उसे कहीं और रखकर पढ़ाया जाये। स्थान परिवर्तन से शायद उसे खोया आत्मविश्वास, आत्मबल मिल सके। उनका सोचना ठीक निकला। उन्होंने उसका दाखिला दिल्ली के एक कालेज में करवा दिया। वहाँ दिव्या की मौसी रमा रहती थी जिसके सानिध्य में उसे सदा अपनापन महसूस होता रहा था। वहाँ रहकर दिव्या ने एक नया जीवन प्रारंभ किया। अब उसके जीवन का उद्देश्य पढ़ाई बन गई थी। रमा कहती दिव्या एकदम बदल गई है। आखिर उसकी मेहनत रंग लाई। ग्रेजुएशन उसने फस्र्ट डिवीजन विद डिस्टिंगशन के साथ पास किया।


अब उसने सिविल सर्विसिस की तैयारी प्रारंभ कर दी। इसके लिये उसने वहीं कोचिंग ज्वाइन कर ली। वह रात के दो बजे तक पढ़ती तथा सुबह छह बजे उठकर फिर पढ़ाई शुरू कर देती उसकी लगन और मेहनत रंग लाई। प्रथम बार में ही उसका नाम सफल केंडीडेट की सूची में था।


विनय का मानना था कि लड़कियों को एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में जाना चाहिये पर उसने पुलिस सर्विस को चुना। कारण पूछने पर वह चुप रह गई। उन्होंने भी इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया... आखिर बच्ची ने अपनी मंजिल पा ली थी, उसकी खुशी में ही उनकी खुशी थी।


मोबाइल की अनवरत बजती घंटी ने उसकी तंद्रा को भंग कर दिया। फोन उठाया उधर दिव्या की आवाज थी, ‘ममा, आपने फोन किया था...।’


‘हाँ, तुम्हारे यहाँ स्थानांतरण की खबर पढ़कर मैंने इस खबर की पुष्टि करनी चाही थी।’


‘ऑर्डर तो मुझे अभी मिला है और अखबार वालों ने खबर भी छाप दी...।’ उसने आश्चर्य से कहा।


‘हाँ बेटा, मीडिया आजकल चार कदम आगे ही रहती है। बेटा, तू कब आ रही है...? हम सब तुम्हारा यहाँ बेसब्री से इंतजार कर रहे है।’


‘माँ कुछ फार्मेल्टी पूरी करनी होंगी, उसके पश्चात् पहुँच जाऊँगी। मैं भी बहुत खुश हूँ, काफी दिनों बाद आपके साथ रहने का अवसर मिल रहा है।’


हम सब उसके आने की प्रतीक्षा करने लगे। आखिर वह दिन भी आ गया जब दिव्या को आना था। हमारे अतिरिक्त, पुलिस स्टाफ भी उसके स्वागत की तैयारी में रेलवे स्टेशन पहुँचा हुआ था...। बड़ी मुश्किल से वे उससे मिल पाये। तुरंत ही उसे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी अतः वह चली गई।


इतनी बड़ी पोस्ट पर रहने पर व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, भावनाओं पर अंकुश लगाना पड़ता है। घर-घर आते-आते रात के आठ बज गये। नई जगह-नया काम मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। यह हम भी समझते थे।


अब आकांक्षा भी चाहने लगी थीं कि दिव्या घर बसा कर सेटिल हो जाये। मान सम्मान, धन दौलत इंसान के जीवन में बहुत महत्व रखती है पर यह भी सच है कि बिना घर, बिना साथी के इंसान अधूरा है। काम से थका हारा इंसान सांझ तले जब घर लौटता है तो अपनों का प्यार भरा इंतजार उसकी सारी थकान, सारा तनाव हर लेता है। इंसान को कभी-कभी अपने लिये भी जीना चाहिये पर हर बार वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देती या कहती मेरा काम ही ऐसा है जहाँ घर नाम की चीज के लिये गुंजाइश ही नहीं है। मैं विवाह करके किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती।


दिन बीतते गये... पुलिस की नौकरी थी अतः हर दूसरे तीसरे वर्ष ही उसका स्थानांतरण होता रहता था। विनय रिटायर हो गये थे। दिव्या के प्रति चिंता ने उन्हें उसके साथ ही रहने को मजबूर कर दिया था। विवाह के प्रति उसकी सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया था। दिन प्रति दिन उसका व्यवहार रूखा होता जा रहा था। वह सोचती शायद काम के प्रति अतिसंलिप्तता ने उसे रूखा एवं संवेदनहीन बना दिया है।


उसकी व्यस्त दिनचर्या के साथ वे एडजस्ट हो रहे थे कि एक दिन पेपर पढते हुए एक समाचार पर नजर ठहर गई... लाॅ काॅलेज की एक लड़की को उसके कॅालेज के ही कुछ लड़कों ने अपहरण करके रेप किया तथा एक्सीडेंट का केस बनाने के उद्देश्य से अर्धमूर्छितावस्था में उसे मरने के लिये सड़क पर फेंक दिया पर वह बच गई थी। दिव्या खन्ना व्यक्तिगत रूप से इस केस की छानबीन कर रही है वह दिन दूर नहीं है जब अपराधियों को उनके किये की सजा जरूर मिलेगी। पीड़िता निवा श्रीवास्तव ने पूर्ण सहयोग का वचन दिया है।


यूँ तो दहेज हत्या, अपहरण एवं बलात्कार की घटनायें आजकल नित्य ही अखबार की सुर्खियों में रहती है पर जिस बात ने उसका ध्यान आकर्षित किया, वह थी कि उस लड़की को न्याय दिलवाने में दिव्या महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। खबर पढ़कर आकांक्षा बुदबुदा उठी थी... व्यर्थ में झंझट में पड़ रही है लड़की... न घर की रहेगी, न घाट की। जगहसाई अलग से होगी... कौन उसका हाथ थामेगा...? सबसे ज्यादा दुख तो उसे इस बात का था कि भुक्तभोगी दिव्या उसको न्याय दिलवाने के नाम पर उसकी छीछालेदर करवायेगी...।


शाम को दिव्या घर आई... उसे चाय देते हुए अपने मन के द्वंद्व को छिपा नहीं पाई तथा अपने मन का संशय उसके सामने रख दिया। सुनकर तिलमिला उठी थी वह, बोली, ‘ममा, हमारी ऐसी ही सोच अपराधियों को अपराध करने के लिये प्रेरित करती है। हम औरतें ही अगर अपने ऊपर हुए जुर्म प्रति आवाज नहीं उठायेगी तो कौन उठायेगा? जहाँ तक बदनामी का प्रश्न है... उसने कोई गुनाह नहीं किया है। बिन किये अपराध की सजा मन ही मन भुगतते हुए वह पूरी जिंदगी कुंठा में क्यों गुजारे? अपराधियों को निशंक क्यों घूमने दे? क्या इसलिये कि वे बेखौफ होकर इसी तरह की दूसरी घटना को अंजाम दे सकें...?’


‘पर बेटी, स्त्री का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है... अगर एक बार उसके चरित्र पर दाग लग गया तो मिटाये नहीं मिटेगा।’ आकांक्षा ने पुनः कहा।


‘ममा, स्त्री को देह के दायरे में बाँधकर परिभाषित मत करो... देह से परे भी उसका अपना एक अस्तित्व है, अस्मिता है। देह पर अत्याचार हो सकता है पर अस्मिता पर नहीं... देह मैली हो सकती है पर चरित्र नहीं। देह नश्वर है पर स्त्री की सोच सार्वभौमिक है। उसे किसी दायरे में बाँधकर रखना स्त्री का अपमान करना है। यही सोच आज स्त्री को हर आतताई, अनाचारी से प्रतिशोध लेने को प्रेरित कर रही है। आखिर क्यों न ले प्रतिशोध? उसने कोई गुनाह नहीं किया है फिर वह क्यों छिपे या डरे? क्या स्त्री ही सदा अग्निपरीक्षा देती रहेगी...? सृष्टि को रचने वाली, संवारने वाली, अपने ही कुपूतों, नाशुक्रों को कब तक माफ करेगी...? परिवर्तन तो धरा का नियम है ममा... आज की स्त्री कमजोर नहीं है। मैं कमजोर थी ममा, जो चुप रह गई पर वह लड़की कमजोर नहीं है। आज उस जैसी ही लड़कियों की आवश्यकता है। कम से कम अपराधियों को सजा दिलवाकर कुंठा से मुक्त तो हो सकेगी। मेरी तरह ताउम्र बिन किये अपराध की सजा तो नहीं भोगेगी...!!’ कहते हुए वह सुबक पड़ी थी। मानो उस रात का एक-एक पल उसकी आँखों में तिर आया हो।


जब तक आकांक्षा कुछ कहती, वह उठी और अपने कमरे में चली गई। आज उसे अपनी ही बेटी अन्चीन्ही लग रही थी। जिस दिव्या को वह कठोर, अनुशासित, कर्मठ, काम के प्रति सर्मपित समझती रही थी, वह अंदर ही अंदर इतनी खोखली हो चुकी है, उसने सोचा भी न था। तो क्या वह आज भी उस घटना को नहीं भूली है...?


‘कम से कम अपराधी को सजा दिलवाकर वह कुंठा से मुक्त तो हो सकेगी...।’ बार-बार यह वाक्य आकांक्षा के दिल में हथौड़ी की तरह प्रहार कर रहा था। जैसे-जैसे वह सोचती गई दिल के बंद दरवाजे खुलते गये... सच ही तो कह रही है दिव्या... हम भले ही दुनिया के सामने नाटक कर लें पर स्वयं क्या सच्चाई को झुठला पाते है? मन ही मन हीन भावना के शिकार होकर दुनिया से तो क्या, स्वयं से ही मुँह नहीं चुराने लगते है? इससे तो अच्छा है कि सच्चाई को स्वीकार करते हुए दिल में चुभे काँटे को एक झटके से निकालकर बेदर्दी से मसलते हुए निकाल फेंके। दर्द एक बार होगा, नासूर तो नहीं बनने पायेगा तब शायद जिंदगी सहज हो पाये...। दिव्या के कहे वाक्यों ने उसकी सोच बदल दी थी। अनायास ही वह अपराधबोध से ग्रसित हो उठी... उसके ही कारण उसकी बेटी आज भी असामान्य जिंदगी जी रही है पर वह भी क्या करती? उस समय उसने वही किया जो उसे ठीक लगा था...।


आकांक्षा को बदलते समीकरणों का एहसास होने लगा था... दिव्या ने उसके सम्मुख एक नई औरत का खाका खींच दिया था। आग की भीषण लपटों से कुन्दन बन निकली लड़की जो सब वर्जनाओं से मुक्त हो चुकी है। वह देह की सीमाओं से परे, आत्माभिमान और आत्मसम्मान से जीना चाहती है। पुरूषों के एक छत्र साम्राज्य को चुनौती देती, तेजी से आगे बढ़ती... हर जगह अपने निशां छोडती, अपनी पहचान बनाने में जुटी है।


‘ममा, मीटिंग में जा रही हूँ... आने में देर हो सकती है खाने पर इंतजार मत करना...।’


थोड़ी देर पहले सुबकती दिव्या को अतिआत्मविश्वास के साथ बाहर जाते देख उसकी आँखें जुड़ा गई... कोई बात थोड़ी देर के लिये भले ही उसे दंश दे दे पर अपनी परेशानी की वजह से वह अपने कर्तव्य से मुख नहीं मोड़ेगी। हर समस्या का डट कर मुकाबला करेगी। अपने ऊपर हुए अन्याय का प्रतिकार वह भले ही न कर पाई हो पर दूसरे के ऊपर हुए अन्याय पर वह चुप नहीं बैठेगी। उसे न्याय दिलवाकर रहेगी। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने ‘वूमन सेल’ बनाकर स्त्री अधिकारों प्रति जागरूकता अभियान चलाया था। एकाएक उसे दिव्या पर गर्व हो आया था।


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