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Ranjana Mathur

Drama Romance

4  

Ranjana Mathur

Drama Romance

बड़ी प्यारी है चाहत तेरी

बड़ी प्यारी है चाहत तेरी

4 mins
328


"लगाव....

"प्यार.....

"मुहब्बत.....

"प्रेम.....

"इश्क.....

कई रूप हैं चाहत के,लेकिन पंडिताइन जी की आशिकी और सूरजप्रकाश जी ताऊजी की आजिज़ी काबिले गौर थी। प्यार कभी भी परवान चढ़ सकता है, यह बात अब समझ में आई, जब विवाह के पश्चात् मैं खुद घर-गृहस्थी के जंजाल में फंसा।"


हम बहुत छोटे थे और अपने सगे व चचेरे भाई-बहनों के साथ उछल- कूद करते -फिरते थे। स्कूल से आने के बाद खाना खाकर थोड़ी देर पढ़ लेते थे खेल की आस में।

पाँच बजते-बजते हम सब बच्चे अपने कमरों से निकलकर ऐसे भागते जैसे गधे के सिर से सींग। ये गए वो गए।

जैसे ही ठीक साढ़े छह बजते एक अजब बात होती। हमारे दूर के रिश्ते के एक ताऊ जी थे , जो कि ऊपर वाली मंज़िल पर अकेले रहा करते थे। ताईजी का स्वर्गवास हो चुका था व खुद निस्संतान थे। ठीक साढ़े 6 बजे उनके पास एक पंडिताइन जी आया करतीं बढ़िया-बढ़िया भोजन और भांति-भांति के माल-ताल ले- लेकर।

दरअसल होता यह था कि हम नीचे से ऊपर तक बिल्डिंग में दौड़ते और छिपते-फिरते थे। जब थक कर प्यास लग जाती तो किसी भी घर में घुसकर पानी पी आते। सभी घर जो अपने थे। एक बार हम ऊपर ताऊ जी के कमरे में पहुंच गए तो देखते क्या हैं कि पंडिताइन जी ताऊजी को कटोरी में से चम्मच से अपने हाथों से कुछ खिला रही हैं और पीने का पानी पास रखकर ताऊजी को पंखा झल रही हैं। जब हम बच्चे पहुंच गए तो ताऊजी पंडिताइन जी से रौब से बोले - "बच्चों को भी रबड़ी खिलाओ।"

"हाँ जी। अभी लीजिए ।" वे बोलीं और हमें कटोरी में रबड़ी डाल कर दी।

"बच्चों ये ताई जी हैं। इन्हें आज से ताई जी ही बोलना।" ताऊजी की रौबीली आवाज गूंजी।

"जी ताऊजी "हम बोले।

वाह वाह! क्या लाजवाब रबड़ी थी। कसम से, वैसी जीवन में आज तक नहीं खाई हमने।

बस फिर क्या था। हम प्रतिदिन कोशिश करते कि ताई जी के आने के बाद कोई न कोई ताऊजी के कमरे में पानी पीने अवश्य जाए। बालबुद्धि में लोभ ने ऐसा डेरा डाला कि लालचवश हम बच्चों ने ताऊजी के कमरे में पानी पीने का क्रम बांध लिया ताकि हरेक बच्चे के हाथ ताईजी के हाथों बना स्वादिष्ट खाना आ सके। हमारे तो मज़े हो गये।


अब बाल मन में एक जिज्ञासा उठी कि आखिर यह ताईजी हैं कौन?

ताऊजी से तो भय लगता था। अतः हम बच्चों ने तय किया कि अपनी अपनी मम्मियों से शंका का समाधान किया जाए।

एक शाम को मैंने पहले तो ताईजी के द्वारा लाए गए स्वादिष्ट माल पर हाथ साफ किया क्योंकि संयोगवश उस दिन मेरा नम्बर था। मैं खेल ख़त्म करके अपने कमरे में जा ही रहा था कि मम्मी को चाची से बात करते देखा। मैं भी वहीं खड़ा हो गया और माँ का पल्लू पकड़ कर हिलाया - "मम्मी ये ताईजी कौन हैं?"

मम्मी चौंकी-"कौन ताईजी बेटा।"

"अरे वही! जो रोज़ाना बहुत ही स्वादिष्ट रबड़ी, खीर, हलवा, पूरियां, लड्डू, बाटी, चूरमा बना-बनाकर लाती हैं खूब सारा, और फिर ताऊजी को अपने हाथों से खिलाकर पंखा भी झलती हैं और अगर हम जाते हैं तो हमें भी प्यार से खिलाती हैं।" मैंने बताया।

चाची ने कहा - "बेटा तुम पंडिताइन जी को ताईजी क्यों कहते हो? "

मैंने कहा -"हमसे ताऊजी ने ऐसा बोलने को कहा है"

मम्मी और चाची मेरी बात सुनकर एक साथ हँसीं और चाची ने मम्मी के कान में जो कहा वह भी मैंने सुना यह तो वह बात हुई कि -" बिन फेरे हम तेरे"और दोनों मुस्कुरा दीं।

चूँकि ताऊजी घर में सब से बड़े थे अतः पूरा घर उनका सम्मान करता व उनसे डरता भी था यहाँ तक कि घर के पुरुष भी। ताईजी का ताऊजी से इतना मजबूत रिश्ता देखा कि हमारे घर के हर तीज-त्यौहार, शादी में वे ज़रूर मौजूद रहतीं। उनसे ही सब रीति-रिवाज़ पूछते।

हम थोड़े सयाने हुए तो पता चला कि कभी ताऊजी व ताईजी बचपन में साथ खेले बढ़े थे। प्यार का अंकुर तभी से पनपा हुआ था। समझ में आने लगा कि ताऊजी व ताईजी एक दूसरे को पसंद करते हैं व दोनों ही अपनी-अपनी ज़िन्दगी में अब अकेले हो गये हैं। संभवतः ईश्वर भी उन्हें मिलाना चाहता था।

ताईजी ने ताऊजी को आखिरी वक्त तक संभाला व उनके निधन के बाद स्वयं को ऐसा सूना व उदास बना लिया जैसे सचमुच विधवा हो गई हों। विश्वास कीजिए ताऊजी के निधन के ग्यारहवें दिन वे भी उनके ग़म में दुनिया छोड़ चलीं। वाकई अमर थी चाहत उनकी।



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