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प्रेमयाद कुमार नवीन

Classics

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प्रेमयाद कुमार नवीन

Classics

बचपन बुढ़ापा और यादों का सफ़र

बचपन बुढ़ापा और यादों का सफ़र

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जब भी समीर अपने बुजुर्ग पिता को गाड़ी में बैठाकर कहीं बाहर जाता है, तो उसकी आँखों के सामने बीते दौर की यादें किसी सुनहरे चलचित्र की तरह ताज़ा हो जाती हैं। वे भी क्या दिन थे, जब समीर एक छोटा बच्चा था और उसके पिता अपनी पूरी जवानी की ऊर्जा से भरे हुए थे। समय का चक्र ऐसा घूमा कि आज वह बच्चा खुद बड़ा होकर एक जिम्मेदार पिता बन चुका है और उसके पिता अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ शरीर कमजोर हो चला है। लेकिन उम्र बढ़ने के बावजूद, आज उसके पिता का दिल फिर से एक बच्चे जैसा हो गया है। यह बात बिल्कुल सच है कि बुढ़ापा और बचपन एक जैसे होते हैं; दोनों ही अवस्थाओं में इंसान का दिल तमाम सांसारिक चालाकियों से दूर, बिल्कुल निष्छल और बाल-सुलभ हो जाता है। समीर को अक्सर अपने पिता के साथ उस पुराने दौर में बिताए पल याद आते हैं। आज की गाड़ियाँ भले ही नए मॉडल, बटन-स्टार्ट और आधुनिक तकनीक की हैं, पर उस दौर की बाइक और स्कूटरों की बात ही कुछ अलग थी। तब लोग वाहनों को सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं समझते थे, बल्कि वे घर के एक सदस्य की तरह होते थे। उनसे परिवार की ढेरों भावनाएं, अनगिनत कहानियां और दिलचस्प किस्से जुड़े होते थे।

 उस दौर में 'राजदूत' बाइक शान की सवारी हुआ करती थी, जिसमें पहले वो 'कील' जैसी अजीब सी चाबी लगती थी। अपनी मज़बूती और भारीपन के कारण लोग इसे प्यार से 'दूध वाली गाड़ी' भी कहते थे। लेकिन उसका किक-स्टार्ट ऐसा था कि पूछो मत..... अगर आज के दौर की तरह बिना प्रेशर बनाए कोई किक मार दे, तो सीधा स्वर्ग का रास्ता खुल जाता था।
राजदूत की किक ऐसी खतरनाक 'बैक रीबाउंड' मारती थी कि टखने में मोच आना या पैर का कचूमर बनना बिल्कुल तय था।
उसे चालू करना अपने आप में किसी हुनर से कम नही था। बाद में वक्त बदला और 'राजदूत इलेक्ट्रॉनिक' मॉडल आया, जिसने इस नॉर्मल चाबी और किक के खौफ को थोड़ा कम किया।


 उसी दौर की दूसरी जान था—

बजाज का 'चेतक स्कूटर'। 'हमारा बजाज' सिर्फ एक विज्ञापन या स्लोगन नहीं था, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवारों की धड़कन हुआ करता था।


 संडे के दिन सुबह-सुबह पूरे जतन से स्कूटर को एक तरफ झुकाकर, किक मारकर स्टार्ट करना और फिर पूरे परिवार का उस पर बैठकर शान से निकलना, यह एक ऐसा सुख था जिसे आज की पीढ़ी कभी महसूस नहीं कर सकती। बजाज चेतक और राजदूत जैसी गाड़ियाँ अपने दौर की असली महारथी थीं। रास्ते आज भी वही हैं, लेकिन अब गाड़ियों को लेकर वो जतन, वो लगाव और वो ख़ुशी दिखाई नहीं देती। अब वाहन सिर्फ एक बेजान मशीन बनकर रह गए हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ यादों का वह दौर फिर लौट रहा है, क्योंकि मार्केट में अब नए रूप में 'इलेक्ट्रॉनिक चेतक' आ गया है। इस नई इलेक्ट्रिक गाड़ी को चलाते वक्त समीर हर बार उसी गुज़रे दौर में लौट जाता है।

 वक्त बदल चुका है–

 तब वह एक बच्चा था, पर आज वह जवान और खुद एक पिता है। आज उसके पिता का दिल बच्चों की तरह हो गया है, जो उस गाड़ी में पीछे बैठकर बड़े चाव से हवा का आनंद लेते हुए सैर करते हैं। पहले उसके पिता समीर को आगे बिठाकर सैर कराया करते थे, और आज समीर अपने पिता को कराता है। भले ही गाड़ियों के मॉडल बदल गए हैं और तकनीक नई आ गई है, पर इस नए चेतक पर बैठते ही जो एहसास जागता है, वह आज भी बिल्कुल वही पुराना है। गाड़ियाँ बदल गईं, तकनीक बदल गई, पर यादों का वह सुनहरा सफ़र आज भी समीर और उसके पिता के दिलों में वैसे ही धड़क रहा है। 


शुक्रिया और सादर वंदन,
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- प्रेमयाद कुमार नवीन ( नवीं )
20/sep./2026


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