Manisha Aggarwal

Abstract


4.8  

Manisha Aggarwal

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बारिश की एक रात

बारिश की एक रात

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इनका हाथ करवट लेते समय मुझे लगा तो मैंने देखा कि रात के करीब 1:30 बज रहा है। याद नहीं आया कि कितनी देर से गाने सुन रही थी। पर नींद है कि आने का नाम ही नहीं ले रही है।  बाहर काली घटा छाई हुई है। लगता है बहुत ज़ोरों से बारिश होने वाली है। खैर मुझे क्या करना। ना तो कॉलेज जाना है और ना ही घर के बाहर का कोई काम है। सोचा कि चलो कोशिश कर के देखती हूँ क्या पता नींद आ ही जाये। कितनी ही देर हो गई थी, पर नींद है के आती ही नहीं। बस करवट पर करवट ही लिए जा रही हूँ। ये तो इतनी गहरी नींद में हैं कि इनको भी उठा नहीं सकती। इस वक्त तो कोई बात करने को भी नहीं है। बाहर बिजली चमक रही है और बादल भी खूब ज़ोर से आवाज कर रहे हैं। चलो ज़रा उठ के देख लेती हूँ कि सारे दरवाज़े बंद तो है ना। कहीं बारिश हो और घर के अंदर पानी आ जाए।

अभी ये सोचते हुए उठने ही लगी थी कि फिर से इन्होंने करवट ली और फिर से हाथ लगा। पता नहीं क्या क्या देखते रहते हैं सपने में। ऐसा लगता है कयी बार तो जैसे नींद में पकड़न पकड़ाई खेल रहे हैं। पर जो भी हो, अब तो इसकी आदत सी हो चली है। मैं उठी और सारे दरवाज़े अच्छे से बंद कर दिए। जा कर मुन्ना को देख लू ज़रा। वो तो आराम से घोड़े बेच कर सो रहा है। और सोये भी क्यु नहीं, छुट्टियाँ जो चल रही हैं। मैं वहीं थोड़ी देर खड़ी मुन्ने को निहारती रही। मुझे याद है जब पहली बार उसे अनाथ आश्रम में देखा, मुस्कुराते हुए।

लगा जैसे मेरा अपना ही है। मैंने इनसे बात की और आश्रम के सारे कागज़ी कारवाई कर मुन्ना को अपने साथ ले आए। इन्होंने भी आज तक कभी यह नहीं जताया कि यह उनका खून नहीं। बहुत प्यार करते हैं। लगता है हम तीनों जैसे एक दूसरे को पूरा कर दिया है। एक ज़ोर से आवाज आई और सुनाई दिया जैसे बारिश अपने पूरे ज़ोर से शुरू होने का इशारा दे रही है। जैसे ही मैं अपने कमरे में वापिस गयी, बारिश शुरू हो गई थी। मैंने ध्यान दिया कि कमरे की खिड़की खुली है और तेज हवा के साथ बंद होते हुए शोर कर रही है।

मैं अभी खिड़की बंद करने गयी ही थी कि मुझे बारिश के कारण हुई मिट्टी की खुशबु का एहसास हुआ। कितनी अच्छी लग रही है, लगा जैसे मैं अपने बचपन में पहुंच गई हूँ। वो भी क्या दिन थे जब हम बारिश में इकट्ठे होकर खेला करते थे। मम्मी सबके लिए आलू प्याज के पकौड़े और गुड़ के गुलगुले बनाती थी। गलियों में पानी भर जाता था और हम सब गली के बच्चे बारिश बंद होने पर इकट्ठे होकर wकागज की नाव बना कर प्रतियोगिता करते थे कि किसकी नाव सबसे आगे रहेगी। मुझे याद है कि मैं कभी इस खेल में प्रथम नहीं आती थी।

तब एक आज़ादी सी महसूस होती थी। कोई रोकने वाला नहीं। कोई काम का डर नहीं होता था कि यह भी करने वाला है, वो भी करने वाला है। कितना अच्छा लगता था। समय कैसे गुजर जाता था पता ही नहीं चलता था। पर अब ऐसा क्या हुआ कि बारिश में जाना तो दूर, यदि हल्का सा बारिश का पानी लग भी जाये तब भी डर लगता है कहीं बिमार ना हो जाये। अब तो बारिश के मौसम में पकौड़े खाए भी लगता है जैसे बरसो बीत गए। क्या समय बदल गया है या हम बदल गए हैं? यही सोचते हुए खिड़की बंद की और लेट गयी।

न जाने कब नींद आ गयी। सुबह उठ कर देखा तो बारिश बंद हो गई है। बारिश की जगह अब धूप ने ले ली है।


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