बालक से प्राप्त शिक्षा-१९
बालक से प्राप्त शिक्षा-१९
बालक को किसी प्रकार के मान अपमान का बोध नहीं होता।उसका किसी ओर ध्यान नहीं रहता । वह अपने खेल में मग्न रहता है । दत्तात्रेय जी कहते हैं कहते हैं कि बालक से उन्होंने अपने आप में ही संतुष्ट रहना सीखा है।
दत्तात्रेय जी यदु महाराज से कहते हैं- छोटे बालक की तरह मुझे भी मान अपमान का कोई ध्यान नहीं है। घर और परिवार वालों की चिन्ता जो लोग करते हैं वह मुझे नहीं है। मैं अपनी आत्मा में ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीड़ा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालक से ली है अतः उसी के समान मैं भी मौज से रहता हूँ। न मुझे मान की इच्छा है, न अपमान का शोक है। मान अपमान से परे अपने में मस्त रहना मैंने छोटे बालक से सीखा है।
इस संसार में दो ही प्रकार के व्यक्ति चिंता मुक्त निश्चिन्त और अपने परमानन्द में मग्न रहते हैं।एक तो भोला- भाला अज्ञ बालक और दूसरा वह पुरुष जो प्रकृति के तीनों गुणों से अतीत हो गया है, और दिव्य आनन्द से ओतप्रोत रहता है। पारिवारिक जीवन में माता- पिता सदैव अपने घर, अपने बच्चों तथा अपनी प्रतिष्ठा के विषय में चिन्तित रहते हैं ।दत्तात्रेय जी कहते हैं कि मुझे इन बातों से कुछ भी लेना देना नहीं है मैं न तो किसी परिवार के लिए चिन्ता करता हूँ, न ही मैं मान - अपमान की परवाह करता हूँ । इस प्रकार मैं पृथ्वी पर बालक की भाँति विचरण करता रहता हूँ।
