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अंधेरा छंट गया

अंधेरा छंट गया

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विराज को असमय घर आया देखकर वैशाली परेशान हो गई। पच्चीस वर्ष के कैरियर में यह पहली बार हुआ था जब वह ऑफिस के समय में, बिना कोई सूचना दिए घर आए हैं वरना आने से पहले ही उनका फोन आ जाता था कि मैं आ रहा हूँ, मेरा सूटकेस तैयार रखना मुझे अभी निकलना है। प्रारंभ में उनके काम के जुनून को देखकर उसे बहुत ही क्रोध आता था पर धीरे-धीरे उनके काम की अहमियत जानकर वह अपने क्रोध पर साधना सीख गई थी।  ऐसे ऑफिशियल टूर के लिए उनका सूटकेस सदा तैयार रहता था। 


'अचानक... तबियत तो ठीक है न। 'चपरासी के ब्रीफकेस रखकर जाते ही वह पूछ बैठी। 

'क्या अपने घर अचानक नहीं आ सकता?' चिल्लाते हुए विराज ने कहा।

'ऐसी बात नहीं है दरअसल...।'

'दरअसल क्या…?' कहकर विराज कमरे के अंदर चले गए।


विराज के चेहरे पर झुंझलाहट स्पष्ट झलक रही थी। वैशाली समझ नहीं पा रही थी अचानक उन्हें हो क्या गया है। अगर तबियत खराब नहीं है तो अचानक ऐसे घर आना। चेहरे पर झुंझलाहट के साथ हताशा निराशा... जब कुछ समझ में नहीं आया तो वह पानी लेकर उनके पास गई। उसने देखा विराज पलंग पर माथे पर हाथ रख कर लेटे हैं। पानी के लिए आग्रह किया तो कह दिया रख दो मैं ले लूँगा।


कुछ देर खड़े रहने पर भी विराज के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया तब वैशाली ने सोचा चाय बना कर ले आऊं क्योंकि विराज के अनुसार चाय की एक चुस्की उनकी पूरे दिन की थकान को मिटाकर तरोताजा बना देती है। इसके साथ ही वह चाय की चुस्कियों के साथ उसके साथ ढेरों बातें किया करते हैं।


मन में यह विचार आते ही वैशाली चाय लेकर आई। चाय पीने का आग्रह करने के बावजूद उनकी वही दशा देखकर वह उनके सिरहाने बैठ कर उनके बालों में उंगली फिराते हुए मधुर स्वर में बोली, 'मन में कुछ परेशानी हो तो प्लीज कह डालिए पर आपकी यह चुप्पी अब मुझसे सही नहीं जा रही है।


'लगता है मेरी तीस वर्ष की मेहनत पर पानी फिर गया है। मुझे दरकिनार करके मेरे ऊपर एक जूनियर बिठा दिया गया है।' विराज के शब्द बड़ी मुश्किल से निकल रहे थे।

'आप तो इस पद के प्रबल दावेदार हैं आपका नाम भी योग्यता सूची में था।' कहते हुए वैशाली भी हतप्रभ थी।

'शायद किसी के दबाव में सूची बदल गई।'

'पर ऐसा कैसे हो सकता है ? आप पता लगाइए।'

'आजकल सब कुछ हो सकता है। अब पता लगाने से भी क्या फायदा ? जब आर्डर निकल गया है तो चेंज तो होगा नहीं। 

'आप इसके विरुद्ध कोर्ट में जा सकते हैं ।'

'कोर्ट... क्या तुम नहीं जानती कोर्ट से जजमेंट मिलने में वर्षों लग जाते हैं ? उसमें भी क्या भरोसा कि निर्णय अपने ही फेवर में हो।'

'फिर आप सूचना के अधिकार द्वारा मैनेजमेंट से पूछ सकते हैं कि आपको इस पद के योग्य क्यों नहीं समझा गया।

'यह तो पूछूंगा ही पर इससे भी कुछ नहीं हो पाएगा, संदेह है। ऐसे व्यक्ति के नीचे काम करना मेरे लिए संभव नहीं है जिसने मुझसे ही क ख ग सीखा हो।'

'कौन है वह ?'

'राजीव पासवान ...।'

'क्या वही राजीव पासवान है जिसने बाईस वर्ष पूर्व ज्वाइन किया था। वह तो आपसे बहुत जूनियर है। ऐसा कैसे हो सकता है ?'

'मैंने कहा ना आजकल सब कुछ हो सकता है... पर मैं ऐसे माहौल में काम नहीं कर सकता। अगर वह यहाँ रहा तो मैं यहाँ नहीं रहूँगा। मैंने मैनेजमेंट को लिख दिया है कि मेरा स्थानांतरण कंपनी की दूसरी सब्सिडरी में कर दिया जाए अगर मेरी बात नहीं सुनी गई तो मैं रिजाइन कर दूँगा या लंबी छुट्टी ले लूँगा।'

 'लंबी छुट्टी लेने से क्या फायदा होगा ?'


कुछ होगा या नहीं या तो नहीं पता पर शायद इस बीच सम्मानजनक जीने का कोई रास्ता निकाल पाऊँ। यहाँ रहा तो शायद जी नहीं पाऊँगा। वैसे भी अपनी नज़रों में गिर जीना जीना नहीं कहलाता।'

वैशाली जानती थी कि विराज एक बार जो सोच लेते हैं या कह देते हैं वह करके ही रहते हैं। अगर उन्होंने नौकरी छोड़ दी तो आगे की जिंदगी कैसे कटेगी ? अभी तो सिर्फ विवेक ही सेटिल हुआ है। विराम का अंतिम वर्ष है। वह अभी एम.बी. ए. करना चाहता है। पर यह भी अटूट सत्य है कि ऐसी स्थिति में एक आत्मसम्मानी इंसान काम कर ही नहीं सकता !!

उसे स्वयं आश्चर्य हो रहा था ऐसी व्यवस्था पर जहाँ व्यक्ति की योग्यता, परिश्रम नहीं वरन व्यक्ति की चापलूसी और पैरवी इसके प्रमोशन की वजह बन जाए। इसमें कोई शक नहीं था कि राजीव पासवान अपनी मेहनत और काबिलियत के कारण नहीं वरन चापलूसी, पैरवी या शायद मनी पावर के कारण आज इस पद तक पहुँच पाया है। इसके बहुत बड़े-बड़े लोगों से संबंध हैं उसे आज से बाईस वर्ष पूर्व की वह घटना चलचित्र की तरह उसके मनमस्तिष्क में घूमने लगी…


एक ऑफिसर की फेयरवेल के लिए आयोजित फैमिली गेट टुगेदर में एक युवक बड़ी गर्मजोशी से सीनियर ऑफिसर के स्वागत में लगा हुआ था। कभी वह उन्हें सिगरेट पकड़ा कर आता तो कभी कोल्ड ड्रिंक की ट्रे लेकर उनके पास पहुँच जाता। खाने के अंत में इस बीच अगर किसी का कोई बच्चा रोता तो वह उसे भी संभाल लेता था। कुछ लोग उसकी तारीफ कर रहे थे तो कोई कह रहा था बड़ा चिपकू है। उसे इतनी भागदौड़ करते देख एक सीनियर ऑफिसर ने उससे कहा अब तुम भी खा लो। उनकी बात सुनकर उसने बड़ी नम्रता से कहा था सर, आप लीजिए मैं बाद में खा लूँगा।


'कौन है वह चिपकू लड़का।' घर आकर उसने विराज से पूछा था।

'उसका नाम राजीव है। अभी कुछ दिन पहले ही उसका अपॉइंटमेंट हुआ है। भला लड़का है। मेरे मातहत ही वह ट्रेनिंग कर रहा है। उसका व्यवहार मैं भी नोटिस कर रहा था। अभी नया नया आया है, धीरे धीरे सब सीख लेगा। वैसे उसके व्यवहार में बुराई क्या है ? बड़ों का आदर करना आज की पीढ़ी भूलती जा रही है। यह उन सब से अलग लग रहा है। नम्र स्वर में विराज ने कहा स्वर में विराज ने बात समाप्त करते हुए कहा।


एक दिन संजय उनके घर आया। वाकपटु तो वह था ही। पल भर में ही सबसे ऐसा घुल मिल गया कि लगता ही नहीं था कि वह उनके घर का सदस्य नहीं है। जब भी आता विवेक और विराम के लिए चॉकलेट लेकर आता।

'सर बच्चे मुझे बचपन से प्रिय रहे हैं। बच्चों के लिए लेकर आता हूँ। प्लीज सर, मना मत किया करिए। ' विराज के मना करने पर उसने कहा।


राजीव की बातों का यह असर हुआ कि विराज ने कुछ कहना मना कर दिया। विराम ने तो छोटा था पर विवेक उससे इतना घुलमिल गया था कि उसके आते ही शिकवे शिकायतों का दौर शुरू हो जाता। वह कभी उससे मैथ के प्रश्नों का हल पूछता तो कभी अपने प्रोजेक्ट में मदद चाहता। राजीव उसकी हर समस्या को सुलझाने की कोशिश करता। विराम तो जब तक वह रहता उसकी गोद में भी चढ़ा रहता। यहाँ तक कि जाते-जाते वह उससे भी पूछ लिया करता था कि उसे किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं है। यह अलग है कि अपनी मनःस्थिति के कारण उसने उसे कोई दायित्व नहीं सौंपा था। उसके व्यवहार में कुछ तो ऐसा था कि किसी कारण अगर वह किसी दिन नहीं आता तो वह विराज से उसके बारे में पूछ लेती थी। 


जहाँ पहले विराज संजय की इन बातों से अभिभूत थे वहीं अब वह कहते थे कि यह लड़का काम तो कुछ करता नहीं है बस चापलूसी में लगा रहता है। 

एक बार विराज ने राजीव से कह दिया, ' राजीव, काम में मन लगाओ तुम एक जिम्मेदार अफ़सर हो। हमेशा यूँ समय बर्बाद करना तुम्हें शोभा नहीं देता।'

विराज की बात मानकर राजीव ऑफिस के कामों में आने की कोशिश करता फिर वही हाल ...कुछ दिनों बाद विराज का कंपनी की दूसरी इकाई में स्थानांतरण हो गया। 


एक ही विभाग में रहने के कारण विराज को राजीव के बारे में पता चलता ही रहता। वह अपने सीनियर्स को पछाड़ दिनोंदिन तरक्की करता जा रहा था।कोई उसकी तारीफ के पुल बांधता तो कोई व्यंग्यत्मक स्वर में कहता ...अरे, उसकी बराबरी कौन कर सकता है ? उसकी बात ही अलग है, वह काम करे या न करें सीनियर्स को खुश रखेगा तो अपने आप ही तरक्की करता जाएगा।


राजीव प्रारंभ से ही मनमौजी, स्वच्छंद किस्म का आदमी था। अच्छा एकेडमिक रिकॉर्ड होने के बावजूद उसका काम में मन नहीं लगता था लेकिन कुछ भी न करने के बावजूद वह हमेशा बॉस की गुड़ बुक में रहता। लोग तो यहाँ तक कहते कि उसे बॉस के बच्चों को स्कूल पहुंचाने के साथ-साथ उनकी सब्जी लाने में भी कोई हिचक नहीं होगी। बच्चों को स्कूल से आते जाते चॉकलेट, आइसक्रीम भी खिला देने के साथ, अगर मैडम को शॉपिंग कराने ले जाना पड़े तो वह खुशी-खुशी उनके साथ चला जाएगा। 


कोई कहता है, भई, हमसे तो किसी की चापलूसी नहीं होती। वैसे भी चापलूसी की आवश्यकता उसे ही पड़ती है जो अपने काम में ईमानदार नहीं होता। मेहनती, और परिश्रमी भला क्यों किसी के आगे पीछे घूमेगा। आखिर पद की गरिमा भी तो होती है...ऐसे ही लोगों के कारण ही पूरा विभाग बदनाम होता है। इसी धारणा के विराज थे। वे सिर्फ अपने काम से मतलब रखते थे। अगर कोई काम नियम विरुद्ध लगता तो वह सीनियरस तो सीनियरस मंत्रियों से भी टकरा जाते थे। हालांकि इस आदत का उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा था पर इससे भी वह कभी नहीं घबराए ...कह देते, क्या कर लेंगे, स्थानांतरण ही तो कराएँगे। वैसे भी नौकरी पेशा इंसान का बोरिया बिस्तर हमेशा बना रहता है। मैं अपने सिद्धांतों और मूल्यों से कभी समझौता नहीं करूँगा।


राजीव की पत्नी शिखा संजय के बारे में ऐसी वैसी बातें सुनती तो जल भून कर अपने पति को ताना मारती हुई कहती,' लोगों के आगे पीछे घूमने में तुम्हें न जाने क्या मजा आता है ? तुम्हें क्या...लोगों की ऐसी बातें ऐसी बातें सुननी तो मुझे ही पड़ती हैं।'

शिखा की बात सुनकर शांत स्वर में उससे कहता ' तुम एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया करो। मैं जानता हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ। आज का यह इन्वेस्टमेंट कल हमारे काम आएगा।'


शायद संजय सही था। अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का ढिंढोरा पीटने वाले शायद तब यह नहीं जानते थे कि सरकारी महकमे में आज के समय में काम करने वालों की नहीं वरन चापलूसी करने वाले आदमी की ज्यादा चलती है। चापलूसी करना भी कला है जो सब नहीं कर सकते। यही कारण था कि काम न करने के बावजूद उसकी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट सदा अच्छी जाती रही। साथ ही एस. टी., एस. सी. के लिए बने रोस्टर सिस्टम के कारण उसके एलिजिबल होते ही प्रमोशन मिलते गए। एक समय ऐसा आ गया कि वह सबको पीछे छोड़ते हुए वह टॉप मैनेजमेंट तक पहुँच गया। मैनेजिंग डायरेक्टर बनने के लिए बस कुछ सीढ़ियां चढ़नी ही बाकी थीं।


इस स्टेज पर आकर वह काम के प्रति गंभीर एवं ईमानदार होने लगा क्योंकि अब उसे लगने लगा था कि अब सिर्फ चापलूसी नहीं, काम करते हुए भी दिखना चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े लोगों से भी संबंध और प्रगाढ़ बनाने चाहिए। संबंध तभी बनते हैं जब विभिन्न अवसरों पर उन्हें महंगे उपहार दिए जायें। इसके लिए वह कुछ पैसा सदा सुरक्षित रखता आया था।

वैसे भी पैसे की उसके पास कोई कमी नहीं थी काला धन कमाने का कोई अवसर उसने हाथ से नहीं जाने दिया था। वस्तुतः जैसे-जैसे पद बढ़ गया बढ़ता गया, कमाई के अवसर भी बढ़ते गए। जिस पद पर वह था, वहाँ ऐसा करना कोई मुश्किल बात नहीं थी। वैसे भी आजकल काम करवाने के लिए लोगों को ऐसे ही लोगों की तलाश रहती है। 


बेशुमार काले धन के कारण पत्नी बच्चों की प्रत्येक फरमाइश पूरी होने लगी जिससे बच्चे भी खुश रहने लगे। जहाँ पहले उसकी पत्नी उसके उपहार देने के प्रकरणों से चिढ़ती थी, अब उसे कोई आपत्ति नहीं होती थी क्योंकि अब उसे उसका महत्व समझ में आने लगा था आखिर इसी की वजह से तो उनकी बड़े से बड़े लोगों से जान-पहचान बढ़ती जा रही थी।


आखिर वह दिन भी आ गया जब उसका सलेक्शन कंपनी के सर्वोच्च पद के लिए हो गया। उसकी नियुक्त की खबर से पूरे ऑफिस में हड़कंप मच गया था। सीनियरस तो सीनियरस, जूनियर भी इस खबर से आश्चर्यचकित थे। कंपनी के इतिहास में वह सबसे कम उम्र का व्यक्ति था जो काबिल लोगों को किनारे करते थे मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर पहुँच गया था। पहली बार योग्यता सूची में इतना उलटफेर हुआ था। कोई पैरवी तो कोई धन को इसका कारण बता रहा था। अब रोने झींकने से कोई फायदा नहीं होने वाला था। सीनियरस को इस बात का डर था जिसको कभी काम में लापरवाही के लिए उन्होंने डांटा था, वहीं आज वह उन पर हुक्म चलाएगा जबकि साथ वाले इसलिए परेशान थे कि कहीं वह अपनी पिछली बातों का बदला ना निकाले। बस जूनियर ही निश्चिंत थे। 


विराज को डायरेक्ट उसे ही रिपोर्ट करनी थी। बदली परिस्थितियों में जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तब उन्होंने लंबी छुट्टी के लिए अप्लाई कर दिया तथा अपने बेटे विवेक जो अहमदाबाद में एक प्राइवेट कंपनी में बतौर मैनेजर कार्यरत था, के पास चले गए। निर्णय तो उन्होंने ले लिया था पर बार-बार मन में यही आ रहा था ऐसा कितने दिन चलेगा। क्या वह जिंदगी में अचानक छाए घने काले बादलों से छुटकारा पा सकेंगे या यह बादल बरस बरस कर उनकी जिंदगी को दलदल बना देंगे।

उनको अचानक आया देख विवेक और दिव्या की खुशी का ठिकाना ना रहा क्योंकि उनके बार-बार आग्रह करने के बावजूद भी वे अपनी व्यस्तता के कारण उनके पास कभी नहीं आ पाए थे। 


विराज को उदास और परेशान देख, एक दिन विवेक ने कारण पूछा तो वह आदत के विपरीत चुप ना रह पाए। विवेक ने उनकी व्यथा सुनी तो वह सहजता से बोला ,'पापा हम लोग अब बड़े हो गए हैं, अच्छा खासा कमा रहे हैं, आपको काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। बहुत काम कर लिया आपने, अब आप वी.आर.एस. ले लीजिए और आराम से जिंदगी काटिए।'

'बेटा मेरे लिए आराम हराम है। अभी इस उम्र में खाली बैठने की तो मैं सोच ही नहीं सकता। वैसे मेरा मानना है कि मनुष्य का शरीर एक मशीन के समान है। जब तक इस मशीन से काम लेते रहो तब तक यह ठीक रहेगी अन्यथा उसमें जंग लगते देर नहीं लगेगी।'

'पापा, आप इतने अनुभवी और काबिल है कि आपको तो कोई भी कंपनी ऐसे ही रख लेगी...अगर आप मैनेजमेंट का कोर्स कर लें तो और अच्छा है। आजकल तो एग्जीक्यूटिव के लिए अलग कोर्स कराए जाते हैं। 'उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए विवेक ने उन्हें मशवरा दिया।

'पर बेटा , इस उम्र में पढ़ाई...।'

'यह तो सोचने की बात है पापा। आज अच्छे अच्छे पदों पर कार्य अधिकारी स्वेच्छा से अपनी नौकरी छोड़कर या स्टडी लीव लेकर मैनेजमेंट कोर्स करके अच्छे पदों पर मल्टीनेशनल कंपनी में अपना योगदान दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह, यहाँ सिफारिश नहीं योग्यता का मूल्य मिलता है। '


विराज को विवेक की सलाह पसंद आई लोगों को अच्छा लगे पर 55 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने कड़ी मेहनत की प्रशासकीय तो था ही उनकी मेहनत रंग लाई चालीस लाख के पैकेज पर एक कंपनी का उन्हें नियुक्त पत्र मिला, तो एकाएक उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। जहाँ वह तीस वर्षों से लगातार काम करने के बावजूद सिर्फ बीस लाख वार्षिक ही कमा रहे थे वहाँ एकाएक कितना वेतन ...शायद ऐसी ही स्थिति के लिए कहा गया है कि जब एक दरवाज़ा बंद हो जाता है तब दूसरा दरवाज़ा अपने आप ही खुल जाता है। इंसान को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए। 


नई कंपनी ज्वाइन किए अभी कुछ महीने ही हुए थे कि एक पत्र आया। पत्र पढ़कर विराट की खुशी की सीमा न रही... उनकी पहली कंपनी के मैनेजमेंट द्वारा उनके द्वारा उठाए ऑब्जेक्शन को सही मानते हुए उनके वरीयता क्रम के आधार पर उन्हें मैनेजिंग डायरेक्टर का पद देने की पेशकश की थी। पता नहीं राइट टू इनफार्मेशन का असर था या कंपनी में उनके योगदान का, उन्हें उनकी ईमानदारी और परिश्रम का पुरस्कार आखिर मिल ही गया। पर एक बार धोखा खा चुका मन वहाँ जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। वैसे भी अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के कारण उन्होंने सम्मानजनक जीने का रास्ता खोज लिया था अतः अब वह पीछे मुड़कर देखने का प्रश्न ही नहीं था अंततः उन्होंने अपना त्यागपत्र भेज दिया।


वैशाली जो उनकी पीड़ा की प्रत्यक्षदर्शी थी, को ऐसा महसूस हो रहा था कि उनके जीवन में अचानक आए काले घने बादलों को चीरते हुए प्राची की नव किरण दस्तक देने लगी है ...अतीत की सारी बातें भुलाकर वे एक नई दिशा की ओर चल पड़े हैं ।



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