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anand singh

Abstract Drama Tragedy

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anand singh

Abstract Drama Tragedy

Ajnabee

Ajnabee

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 अजनबी ठहर-ठहर कर धीरे-धीरे चलती हुई वह काउंटर पर आकर खड़ी हुई। चेहरे और रंगत से दक्षिण भारतीय लग रही थी—सांवला-सा चेहरा, काजल-सी आँखें, बाल घुंघराले और खुले हुए, दोनों कंधों पर खींचकर लटकाए हुए। लाल रंग की हुडी वाली जैकेट पहने हुए और दोनों हाथ जैकेट की पॉकेट में डाले हुए। बहुत देर तक मेनू बोर्ड को देखते हुए रुक-रुक कर उसने पूछा, "भैया, मोमो रखते हैं क्या?" दिसंबर का महीना खत्म होने को था, अभी-अभी कुछ देर पहले ही सुनहरी धूप में हल्की-सी गुनगुनी धूप ने अंगड़ाई ली थी। मेरी नज़र उस लड़की पर आ टिकी... "नहीं, कुछ और चलेगा..." उसने इंग्लिश में कई सवाल-जवाब किए, और अंत में बर्गर पर आकर मामला रुका... "पर भैया, मैं तो अभी २० रुपये ही दे सकती हूँ, बाकी कल चलेगा...?" बड़ी अजीब बात है, एक अजनबी जब इस विश्वास से आपसे बात करे... आज पहली बार ही तो मैंने उसे देखा था, चाहकर भी मैं मना नहीं कर पाया। पता नहीं क्यों, पहली बार किसी अनजान से मिलकर भी उसे अपरिचित मानने का मन नहीं कर रहा था... कुछ लोग अनजान होकर भी ध्यान खींच लेते हैं, आज कुछ ऐसा ही हुआ... वह एक बर्गर खाकर और कॉफी पीकर गई, पर उससे मिलकर और उसकी बातें सुनकर मेरे अंदर का एक भावनात्मक मन, जो अक्सर गुमनामी में रहता है, जिज्ञासावश या कुछ अनकहा कहने या सुनने की उम्मीद में जग गया... रोज़ कितनों से मुलाक़ात होती है, लगभग सबको भूल जाता हूँ... पर कुछ लोग याद रह जाते हैं... उन्हीं में से यह एक थी...!! "भैया, मुझे एक बहुत रेयर बीमारी है..." "मेरे पापा मुझे प्यार नहीं करते..." "दिल्ली में कोल्ड कॉफी पी थी, बहुत अच्छी थी..." "भैया, क्या जब लोग मर जाते हैं, तब लोग मर जाने वाले से प्यार करते हैं...?" "मेरा बॉयफ्रेंड मुझे बहुत प्यार करता है, मैं इतनी काली-कलूटी हूँ... भैया, वह झूठ बोलता है ना...?" "भैया, मुझे अपने बाल स्ट्रेट कराने हैं..." "अभी मैं ज़्यादा खर्च नहीं कर सकती ना, अभी मैं जॉब नहीं करती... जब मैं ठीक थी तो iPhone था, दिल्ली में जॉब करती थी..." ...और न जाने कितने सवाल-जवाब! "भैया, क्या मैं आपको बीमार लग रही हूँ...?" "नहीं, आप तो बिल्कुल अपने पापा की प्यारी-सी डॉल लग रही हो..." मैं सांत्वना दे रहा था... (हाँ, वह बीमार थी, और कैफ़े के ठीक सामने रीहैब सेंटर आती थी... उम्मीद से भरी और रोज़ तमाम अंतर्द्वंद्व से उलझी, खुद सवाल करती, खुद ही जवाब भी देती... और मुझसे सिर्फ हुंकारी भरवाती... "तुम ठीक हो जाओगी..." बस एक अजनबी और अपरिचित होकर सांत्वना दे सकता था, बस यही कह सकता था...) खामोश लकीरें...


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