आजाद परिंदा
आजाद परिंदा
*****रोज की तरह आज फिर घर पहुचनें में देर हो गई थी , आते ही मोबाइल पर मिस कॉल देखा | श्रीमती का फ़ोन मिस कॉल दिखा, और एक मुस्कुराहट चेहरे पे बिखर गई, साथ में एक दुःख की लकीर भी तैरती गई | तीन साल पहले सुमन की तबियत खराब हुई तो साल दर साल बिगड़ती गई | बेहतर ईलाज के लिए मायके रखना पड़ा तब से सिर्फ़ इंतज़ार और रोज की तरह फ़ोन का सिलसिला | मुझे उसके आवाज से उसके तबियत का पता चल जाता था | हेलो बोलने के बाद सिर्फ़ टूटती सी आवाज में वो मेरा हाल चाल सुन लेती थी और मैं सूखा सा आश्वासन दे दिया करता था और दिन भर में यही उसके टूटते शरीर का संतोष था | फोन बंद कर के मैं बाथरूम में गया, तो ताखे में बैठी फाख्ता ने पंख फडफडा के निर्जीव कमरे में अपने होने का निःशब्द संवाद कर गई और मैं उसे अपने आप को अंजान बने रहने और नजरंदाज कर के उसको सकून से रहने का मूक जवाब दे गया | जब से सुमन का मायका जाना हुआ तब से ये तीसरा दफा है जब वो मेरे नीरस से कमरे को अपने मौजूदगी से गुलजार किये हुए थी | पर समय के साथ अब मुझे उसका मेरे कमरे में होने का एहसास खटकने लगा था और अब मैंने तय कर लिया था कि अब आखिरी है ,और मेरे मन में परिंदे के मनहूस होने की बात घर करने लगी थी | वक्त बीतता गया और मै लगातार एकांकी काम और सुमन के इलाज में व्यस्त रहने लगा, रोज रात एक असहज वेदना मेरे मन को कचोटती सी आती थी , बाथरूम में मंद रोशनी में फ़ाक्ता अब मेरे वजूद को चुनौती देने लगी | उसको अब एहसास हो गया था कि मेरा एकांकी जीवन उसके सुख का ऐशगाह है ,और ये बात मुझे अब बेजुबान से ईर्ष्या का भाव प्रकट कर रहा था | फिर भी मैं उसके घरोंदे को नज़रअंदाज कर के उसे सहज रहने का आसरा देता रहा | दिन बीतता गया सुमन की तबियत ख़राब होती रही और फाख्ता के घरौंदे में चूजों की चहक बढ़ती गई ,एक तरफ मेरा घरौंदा तिल-तिल कर के बिखर रहा था , और परिंदे का कुटुंब लगातार बढ़ रहा था | एक दिन वो अपने बच्चों के साथ उड़ गई और सुमन कि तबियत में थोड़ा सुधार आने लगा, मेरे मन में अब ये बात घर कर गया कि परिंदे ने सारी मनहुसीयत फैला रखी है| एक दो दिन इन्तजार के बाद मैंने घोसले को ताखे से हटा के बाथरूम की खिड़की पे जाली लगा दिया कि अब वो मनहूस परिंदा वापस ना आ सके | दिन बीतता गया और मैं सिद्दत से सुमन के इलाज में लग गया | पर हर सुबह उठ के मैं परिंदे की आवाज सुनता रहा कि कहीं वो फिर तो नहीं आ रही है , कभी-कभी अगर कोई परिंदा मेरे घर के किसी कोने में आ के बैठता तो मैं उसे डरा के उड़ा देता | पर दुर्भाग्य मेरा और सुमन का दामन छोड़ने को तैयार नहीं हो रहा था | आखिर मेरा डर एक दिन सही साबित हुआ| काम से देर रात लौट के मैं कमरे में सोने की तैयारी में था तभी ससुराल से फ़ोन आया , जीजाजी दीदी को अचानक सीहरन सी हुई और वो बेसुध बिस्तरे पे गिरी है, उठ नहीं रही है आप जल्दी आइये | मेरे दिल में टीस उठी और मेरी वेदना को चीरती चली गई , सिर्फ एक बात मन में बार बार आ रही थी क्या फिर वो उठ जाएगी, कितनी बार उसने अपने आखिरी साँसों को धोखा दिया है | नहीं वो बहुत हिम्मती है मेरे जाते ही वो फिर आँखे खोल देगी और मुस्कुरा के देखेगी | सुमन अपने बेटी को और मुझको छोड़ के नहीं जाने वाली है ..वो जीतेगी, और मैं हिम्मत नहीं हारा | चुपके से मैं घर से बाहर आया और घर में किसी को बिना जगाये हजारों सवालो में उलझा ना जाने कब ,... मैं ससुराल पहुंचा | मेरा ससुराल मेरे घर से सिर्फ ५ मिनट के दूरी पे था पर मुझे सिर्फ गाड़ी शुरू करने और ससुराल पहुँचने तक मैं सुमन के साथ बिताये तमाम लम्हों को जी लिया | घर में सुमन निढाल पड़ी थी शरीर तप रहा था , मैं सुमन को आव़ाज देता रहा , पर सुमन आँख नहीं खोली . मेरा डर मेरे सामने आ खड़ा हुआ , वो बिना मिले विदा हो गई कभी ना लौटने को | बुरा दौर बीत गया अब ना डर था ना उम्मीद | सर्द जाड़े में दाह संस्कार के बाद मैं बेसुध नींद भर सोया, अगली सुबह रोज की तरह हुई ,वापस परींदे ने आवाज लगाई पर मैं डरा नहीं ,कमरे से बाहर निकल के मैं उसके तरफ़ देखा और बड़े घमंड से देखा.... मैं तेरे मनहूस होने से नहीं डरता..... आ तू बैठ मेरे घर के किसी भी कोने में,... अब तू मेरा दुर्भाग्य नहीं बढ़ा सकता , देख मैं हारा हुआ जुवारी हूँ ....और मेरे पास खोने को कुछ नहीं | ना जाने कितने दिन मैं सुमन के ना रहने के डर में जीता रहा, तेरी आवाज मेरे दुर्भाग्य की आहट थी , पर देख अब वो ही नहीं तो मुझे किस बात का डर , मैंने बाथरूम के झरोखे को वापस खोल दिया .... अब ना तो किसी बात का डर था और ना ही वहम ....परींदा फड़फडाता हुआ वापस अपने पुराने जगह पे सुकून से जा बैठा और मै बेफिक्री सा वापस सुमन के यादों में ....
