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Ekta Rishabh

Inspirational

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Ekta Rishabh

Inspirational

आत्मसम्मान जिन्दा है अभी !!

आत्मसम्मान जिन्दा है अभी !!

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आज ठण्ड कुछ ज्यादा थी और चाय के शौकीन रमेश बाबू को चाय की तलब फिर से लग रही थी, जब मन को रोक ना पाये तो रसोई के पास जा आवाज़ दी.. " बहु एक कप चाय और मिलेगी।"

"हां हां मुझे तो और कोई काम है नहीं चाय बनाने के अलावा सुबह से दो कप तो पिला दिया है अब दो बर्नर के चूल्हे में से एक पे सिर्फ चाय बनाउंगी तो बन गया नाश्ता खाना आपके बेटे का एक बर्नर पर।"

बहु की कठोर शब्दों ने चाय की छुब्दा शांत कर दी थी रमेश बाबू को आँखों के गीले कोर पोछ वापस अपनी कुर्सी पे बैठ अख़बार में मुँह छिपा बैठ गए।"

धुंधली आँखों से अख़बार के शब्द भी धुंधले हो गए थे उन काले अक्षरों के बीच रमा का चेहरा दिख रहा था।" मुस्कुराता लाल सिंदूर से दप दप करता चेहरा जैसे कह रहा हो " बहु की बातों का बुरा मत मानना जी, इस उम्र में इतनी चाय पीनी अच्छी बात नही आपके स्वस्थ के लिये ही कह रही है बहु।"

कहते है जीवनसाथी की असली जरुरत बुढ़ापे में ही होती है।" पति पत्नी उम्र के अंतिम पड़ाव में हर चीज के सांझेदार होते है।" छोटी खुशियाँ बड़ी और बड़े बड़े गम भी बहुत छोटे हो जाते है जब जीवनसाथी साथ हो कुछ ऐसा ही रमेश बाबू के साथ हो रहा था।" जब तक रमा जी जिन्दा थी किसी बात के लिये इंतजार करना ही नहीं पड़ता रमेश बाबू को जैसे ऑंखें पढ़ना जानती थी वो जादूगर.. हाँ जादूगर ही तो थी रमा जी जिन्होंने हर पल सिर्फ खुशियाँ ही दी थी रमेश बाबू को।" संतान के रूप आनंद का जन्म हुआ।" एक आम सरकारी अध्यापक हो कर भी अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलवाई और समय पे विभा से शादी कर दी।" दोनों बेटे बहु शहर में बस गए और अपनी दुनियां में मगन हो गए।" कभी कभी भूले बिसरे गांव का भी रुख कर लेते।"

रमेश बाबू भी रिटायर हो चुके थे।" सब ठीक ही था की एक रात बिना कोई आहट किये रमा चली गई।" सन्न रह गए रमेश बाबू कोई भला ऐसे जाता है वो भी रमा जिसने बिन पूछे तो दरवाजे की चौखट भी कभी पार नहीं की थी।" ख़बर सुन आनंद और बहु आये थे और सारा क्रिया कर्म कर रमेश बाबू को भी कहा चलने को।"

"क्या चाचा, इस उम्र में आप शहर जाओगे क्या हम आपका परिवार नहीं यही रुक जाइये रमा चाची और आपसे इतना स्नेह मिला है अब सेवा का एक अवसर हमें भी तो दे।" अपने चाचा को जाते देख रमेश बाबू का भतीजा रो पड़ा।"

"ना बेटा, आनंद को बुरा लगेगा फिर मैं कौन सा विदेश जा रहा हूँ आता जाता रहूँगा "और भारी मन से रमेश बाबू ने गाँव छोड़ दिया।"

यहाँ कुछ दिन तो ठीक गुजरे फिर बहु के आँखों में ससुर खटकने लगे।" पहले जो दिल आये खाते घूमते थे अब एक बंधन सा महसूस होने लगा था बहु को शहर की हवा ने बेटे को भी बदल दिया था हर महीने दवाइयों के नाम पे आनंद सारा पेंशन उठा लेता था।"

एक पोता था दस साल का वो भी स्कूल से आ टीवी और मोबाइल में घुसा रहता था।" कभी कभी तो दिन बीत जाता और मुँह से एक शब्द ना फूटते रमेश बाबू के बातें करते भी तो किससे कोई था कहाँ सब मगन थे अपनी दुनियां में।"

एक दिन रमेश बाबू को ख़बर टीवी पे देख रहे थे की पोता अतुल आ रिमोट मांगने लगा, " दीजिये रिमोट कब से देख रहे है अब मुझे कार्टून देखने है।"

"पांच मिनट रुक जा बेटा ये ख़बर सुन लू फिर चला लेना अपना कार्टून।"

"नहीं, मैं एक मिनट नहीं रुकूंगा... आप होते कौन है मुझे रुकने को कहने वाले ये मेरा घर है मेरे पापा ने ख़रीदा है इसे जाने क्यों चले आये हमारे घर में मम्मा ठीक बोलती है.. बोझ हो आप खुद के घर क्यों नहीं चले जाते वही देखने टीवी लाओ रिमोट " और अतुल ने रिमोट छीन ली हाथों से दिल ने एक पल धड़कना बंद कर दिया रमेश बाबू का.. नजरें उठा बहु को देखा जो पास ही खड़ी व्यस्त होने का दिखावा कर रही थी जैसे कुछ सुना ही ना हो लेकिन होठों की कुटिल मुस्कान सब बयां कर रही थी।"

थके क़दमों से वापस अपने कमरे में आ गए सारी रात करवटें बदलती बीत गई..।"

अगली सुबह आनंद उठा तो देखा रमेश बाबू का कमरा खाली था और एक कागज तकिये के पास रखा था।"

प्रिय आनंद,

सदा खुश रहो

तुम्हारी माँ के जाने के बाद बड़े अरमानो के साथ यहाँ तुम्हारे पास रहने आया था ये सोच कर की बुढ़ापे में बेटे बहु और पोते के साथ सुख के कुछ पल बीत जायेंगे।" लेकिन शायद मैं गलत था जिस बेटे को अपने खून से सींचा उसे अब अपने पिता में नहीं उसके पेंशन से ज्यादा मोह हो गया है।" शायद मेरे रहने से बहु को वो आजादी नहीं रह गई जो पहले थी।" मैं तो अपने अंतिम पलों में सुख ढूंढ़ने आया था ना की तुम सब पे बोझ बनने।" मैं गाँव वापस जा रहा हूँ तुम्हारा पिता बूढ़ा जरूर हुआ है लेकिन उसका आत्मसम्मान अभी जिन्दा है और ये आत्मसम्मान मरने पे ही मरेगा।" मेरी फ़िक्र मत करना पेंशन मिलता है मुझे तो दो जून की रोटी कोई भी खिला देगा।"

तुम्हारा पिता..

सर पकड़े वही बैठ गया आनंद।" आँखों से झड़ झड़ आंसू गिरने लगे अब सिवाय अफ़सोस के कुछ नहीं रह गया था आनंद के पास और रमेश बाबू अपने आत्मसम्मान के साथ चल पड़े थे वापस अपनी घर जहाँ उनकी रमा की यादें आज भी उनका इंतजार कर रही थी।" 


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