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Rekha Pandey

Abstract


4.5  

Rekha Pandey

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आत्मचिंतन

आत्मचिंतन

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चौबीस मार्च 2020 को रात 8:00 बजे हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा संपूर्ण लॉक डाउन की घोषणा के साथ मेरे मन में एक बेचैनी सी होने लगी कि

 मेरी दवाइयां या घर के सामान तो मुश्किल से पांच या छह दिन के ही होंगे। समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दवाई लेकर आउं  ।हालांकि संपूर्ण लॉक डाउन में भी जरूरत के सामान के लिए कुछ घंटों की छूट थी परंतु मुझे यह नहीं पता था की जरूरत का सामान मिलेगा कहां से क्योंकि मैं तो अपनी दवाइयां ऑनलाइन स्टोर (नेट मेड )से ही मंगवा लेती थी और राशन के लिए भी अपना बिग बास्केट ,ग्रोफर्स ऑनलाइन स्टोर ही था। यहां तक कि हरी मिर्ची धनिया भी ऑनलाइन स्टोर से ही घर पहुंच जाया करती थी।  

लॉक डॉउन के दौरान मॉल और ऑनलाइन स्टोर दोनों ही बंद कर दिए गए थे इसलिए मेरी बेचैनी का बढ़ना स्वाभाविक था क्योंकि गली नुक्कड़ के दुकानों को तो मैंने स्वयं से कोसों दूर कर दिया था। । ऑनलाइन वाले तो छूट के साथ-साथ सामान घर भी पहुंचा देते थे।

चौक पर मैं बेचैन सी खड़ी थी की लगभग चौबीस पच्चीस साल का युवक मुझसे पूछा आपको किसी चीज की जरूरत है क्या दीदी पीछे पलट कर देखा ,परंतु मैं उस युवक को पहचान नहीं सकी। उसने मुझसे बोला मेरी यही छोटी सी राशन की दुकान है। शायद आपने मुझे पहचाना नहीं मेरी दुकान यहां कई सालों से हैं परंतु ऑनलाइन के चक्कर में दुकान की स्थिति अच्छी नहीं है ,परंतु अगर आपको किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बताइए उसके सीधे-साधे स्वभाव ने मुझे उसने अपनी और अनायास ही खींचा।

मैंने उसे अपनी दवाई और कुछ जरूरत के सामान का लिस्ट दे दिया। उसने मुझे आश्वासन देकर सामान लाने का वादा किया। वह वादा अनुसार दूसरे दिन शाम को दवाई और कुछ राशन लेकर हाजिर हो गया।

उसके जाने के बाद मैं अपने मोहल्ले के दुकानों के बारे में सोच रही थी और आत्मग्लानि का अनुभव कर रही थी कि जरूरत के वक्त आज मुझे न ऑनलाइन वाले मदद कर रहे हैं और ना ही बड़े बड़े मॉल जिसे हम स्टेटस सिंबल के तौर पर अपनाते जा रहे थे।

आज इस मुसीबत के वक्त मदद कर रहे हैं तो हमारे मोहल्ले के छोटे छोटे दुकानदार ,छोटे-छोटे सब्जी वाले, दवाई दुकान वाले

मेरा यह लॉकडॉउन तो आत्म चिंतन में निकल रहा है कि सही में हमें या हमारे देश की कौन मदद कर रहा है। अब तो मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि मैं ज्यादा से ज्यादा सामान अपने घर के आस-पास के छोटे दुकानदारों से खरीदूंगी ताकि उनकी स्थिति के साथ साथ हमारे संबंध भी प्रगाढ़ हो सके।  जहां तक हो सके अपने स्वदेश में बनने वाली चीजें अपनाकर स्वदेशी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश करूंगी।


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