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आश्रित कौन ?

आश्रित कौन ?

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इंसान की सोच ही उसे बनाती हैं, और उसे बिगाड़ती भी है। जो सोचोगे वैसा होगा ऐसा अकसर हम लोगों ने अपने अपने घरों के बड़े बुजुर्गों के मुँह से सुना है। परंतु इंसान करता वहीं है, जो उसका मन चाहता है। जिसने इस मन पर काबू कर लिया वही श्रेष्ठ है।

मैं श्रीकांत अपने घर से दूर यहाँ शहर में काम के लिए रहता हूँ। यह भी एक प्रकार का मन को बन्धन में बाँधना ही है। अपनी तरक्की के लिए या यह भी कह सकते हैं कि घर के जीविकोपार्जन के लिए। विवशता है या परिस्थितियाँ कुछ भी। खैर, रोज की तरह आज भी मैं योगाभ्यास के लिए अपने घर की छत पर गया।

अचानक मैंने कुछ आवाज़ें सुनी। ये आवाज़ें रोज़ सुनाई देती है। यह कुछ और नहीं मिश्रा जी के घर की आवाज़ें है जो रोज़ सुबह आती है। वह आवाज़े हैं।

सुनीता मेरा नहाने का पानी गर्म किया, मेरे कपड़े इस्त्री किये। सुनीता कहाँ हो तुम, अभी तक नाश्ता बना की नहीं।

फिर एक आवाज़ सुनाई दी जो अभी लायी।

रोज़ बिना रुके यह आवाज़ों से मेरी सुबह होती, और इन्ही आवाज़ों से ऑफिस से आने के बाद शाम से रात होती है। करीब सात से आठ महीने हो गये मुझे यहाँ आये हुए। मिश्रा जी से मेरी अच्छी जान पहचान भी है। ऐसा नहीं है कि वह कोई कठोर हृदय के व्यक्ति है। बस, उनका मानना है कि ईश्वर ने सब के काम विभाजित किये है, स्त्रियों के अलग, पुरुषों के अलग।

फिर क्या था इसी वजह से उनके घर का रिवाज़ या कह लो सभ्यता कुछ ऐसी ही बनी हुई थी।

मुझे इस बात का अफसोस नहीं था की एक ही व्यक्ति घर की धुरी पर लटटू बन कर नाच रहा था। मिश्रा जी का भी काम सरल नहीं था क्योंकि वह एक पत्रकार है। दिन भर की भाग-दौड़ उन्हें भी थका देती है।

अब की दो-तीन दिन हो गये, न सुबह मिश्रा जी की आवाज़ आती और न शाम को नुक्कड़ की दुकान पर दिखाई देते। मिश्रा जी मेरे अच्छे मित्र है। उनकी फिक्र होने लगी। जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैं उनके घर गया। उनके घर के दरवाज़े को खटखटाया तो उनकी पत्नी ने दरवाज़ा खोला। मैंने उन्हें नमस्ते किया तो उन्होंने सिर हिलाते हुए नमस्ते का जवाब दिया और मुझे अंदर आने को बोला। अंदर आते ही मैंने देखा मिश्रा जी का बेटा वॉकर में खेल रहा था। मिश्रा जी के हाथ में और सिर में पट्टी बँधी थी, वे बिस्तर पर बैठे हुए थे। वहीं थोड़ी दूर पर कंप्यूटर के सामने बैठ कर उनकी पत्नी कुछ टाइप करने लगी। मैंने मिश्रा जी को सिर हिलाते हुए नमस्कार किया तो उन्होंने सिर हिलाते हुए नमस्कार की स्वीकृति देते हुए मुझे वहीं पास में पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए, दो मिनट रुक कर बात करने का भी इशारा किया।

क्योंकि वह वहीं बैठी अपनी पत्नी से कुछ बोल कर उनसे अपने समाचार पत्र के लिए लेख टाइप करवा रहे थे। मैं वहीं पास में पड़े समाचार पत्र को उठा कर पढ़ने लगा। तभी थोड़ी देर में जब मिश्रा जी का काम समाप्त हुआ तो उन्होंने अपनी पत्नी से बोला अरे ज़रा श्रीकांत बाबू के लिए चाय-नाश्ता लेकर आना।

तब मिश्रा जी की पत्नी चाय नाश्ते की व्यवस्था करने रसोईघर में चली गयी। मैं और मिश्रा जी बातें करने लगे, देखते ही देखते थोड़ी देर में वह हम लोगों के लिए चाय नाश्ता लेकर आयी। मेज़ पर चाय नाश्ता रख कर, अपने बच्चे को पालने से उठा कर अंदर कमरे में ले गयी। हम लोगों की बातें अभी चल ही रही थी कि वह सोते हुए अपने बच्चे को पालने में लिटा कर जो आर्टिकल उन्होंने अपने पति के लिए लिखा था। उसका कठोर प्रति (हार्ड कॉपी) लेकर तैयार करने लगी।

मिश्रा जी को बोली मैं आती हूँ। पलट कर मिश्रा जी बोले संभाल कर जाना और दफ़्तर में सुभाष बाबू के हाथ में ही कागज़ देना। हाँ के इशारे में उनकी पत्नी ने सिर हिलाया और चली गयी। थोड़ी देर बाद में भी वहाँ से चला आया।

ऐसे ही दिन-प्रतिदिन बीतते रहे। कुछ दिन बाद छत पर सुबह योगा करते समय फिर से मिश्रा जी की आवाज़ें उसी तरह से सुनाई पड़ने लगी। तब मुझे समझ आ गया वह ठीक हो गये हैं। अपने दफ़्तर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं।

मिश्रा जी की ज़िंदगी वापिस पटरी पर आ गयी, यह देख कर तसल्ली तो थी, पर हृदय में विनोद का एहसास भी हो रहा था। चाहे कुछ भी हो जाये मिश्रा जी घर की यह किलकारियाँ तो उनके बच्चे के बड़े हो जाने पर भी शायद बंद नहीं होगी।

दिन बीतते गए रोज़ इसी तरह से सुबह से शाम होती और शाम से फिर सुबह और फिर सुबह से शाम। मैं अपने काम में व्यस्त था। किन्तु एक दिन रोज़ की तरह अपने काम से लौटते हुए।

मैंने देखा की मिश्रा जी नुक्कड़ की दुकान से कुछ खरीद रहे थे। हालाँकि मुझे भी कुछ समान लेना था, तो मैं भी वहाँ तक गया। दुकान पर जा कर जब मिश्रा जी को देखा तो कुछ अलग सा कुछ अजीब सा लगा पूछने का मन था किन्तु उनको देख कर ऐसा लगा जैसे दो-चार दिन से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उनके कपड़े धुले तो थे पर इस्त्री नहीं किये हुए थे। शरीर कमज़ोर हो गया था, या थकान थी पता नहीं। खुद को न रोक पाते हुए असमंजस में मैंने सोचा मैं पूछ ही लूँ। जैसे ही मैंने पूछने के लिए उनके कंधे पर हाथ रखा वैसे ही उन्होंने मेरी ओर देखा और मुस्कराते हुए, नमस्कार के भाव में सिर हिलाया मैंने सिर हिलाकर उनका उत्तर दिया। जैसे ही मैं आगे कुछ पूछता उनके मोबाइल की घंटी बजी, और वैसे ही उनका पूरा ध्यान उनके मोबाइल पर चला गया, और वह फ़ोन पर बात करते हुए चले गए।

अचानक से एक आवाज़ आयी। श्रीकांत बाबू क्या सामान दूँ, यह आवाज़ जिस दुकान पर खड़ा था, उस दुकानदार की थी। मैंने समान की पर्ची दुकानदार को पकड़ाई और मैं फिर न जाने किस ख्यालों में खो गया। अचानक फिर दुकानदार की आवाज़ आयी। बाबू जी यह लीजिये आपका समान देख लीजिए सभी चीज़ें हैं कि नहीं। मैंने सामान के थैले की ओर अपनी सरसराती हुई नज़र दौड़ाई और पूछा कितने पैसे हुए। उन्होंने पैसे की पर्ची बनाकर देते हुए कहा-

यही कुछ 950/- रुपये हुए हैं।

मैंने उन्हें पैसे दिए और वहाँ से चला आया। घर आया तो रोज़ की तरह घर के काम करके रात का खाना बना कर खाने लगा तो अचानक मेरा ध्यान मिश्रा जी की हालत पर गया। मैं खाना तो खा रहा था किंतु ध्यान मेरा वहीं था।

खाना कब खत्म हुआ पता नहीं चला। मैं खाना खा कर अपने कमरे में आया। अपने कपड़े बदल कर सोने की तैयारी में लग गया। बिस्तर पर लेट कर एक उपन्यास पढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद जब आँखें थकने लगी तब पुस्तक रख कर सो गया। अगली सुबह हुई मैं दैनिकचर्या से निवृत्त हो कर अपने घर की छत पर योगा करने गया। योगा करते हुए मैंने आभास किया कि, कितनी शांति है। आस पास की कोई आवाज़ नहीं आ रही है। तो फिर मेरा ध्यान मिश्रा जी की ओर गया। आखिर क्या बात हो सकती है। वह इतने थके शिथिल से लग रहे थे, उनके घर से चहल पहल की आवाज़ें भी नहीं आ रही है। मेरा इरादा किसी के घर की ताक-झाँक करना नहीं है। बस जब से मैं इस शहर में आया हूँ उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया है। इसलिए उनसे एक भावनात्मक रिश्ता सा जुड़ गया है।

अपने योगा की गतिविधियों को खत्म करके में नीचे अपने घर में आया और अपनी बाकी की दैनिकचर्याओं को पूर्ण करने में लग गया। देखते ही देखते मेरे दफ़्तर जाने का समय भी हो गया, और मैं तैयार होकर घर को बंद करके दफ़्तर चला गया।

घर से निकलते मैंने सोचा था कि लौट कर मिश्रा जी से शाम को मिलने ज़रूर जाऊँगा।

दफ़्तर पहुँच कर अपनी वहाँ की ज़िम्मेदारियों को पूरा कर के दिन पूर्ण करने के बाद मैं घर के लिए निकलने को तैयार था।

मैं दफ़्तर से घर की ओर निकल पड़ा। जैसे ही मैं मिश्रा जी के घर पहुँचा मैंने उनके घर के दरवाज़े पर ताला देखा। वैसे ही कई सवाल मेरे मन में थे, उनमें एक और सवाल जुड़ गया। यह ताला क्यों ? जहाँ तक मैं जानता था। वह समय के पक्के है और आज अवकाश का दिन भी नहीं, जो परिवार के साथ घूमने गए हो। मैं कुछ क्षण वहीं रुक कर यही सोचने लगा। अचानक मेरे भीतर के शोर और सवालों के बीच एक बाहर की आवाज़ मुझे सुनाई दी। श्रीकांत बाबू, श्रीकांत बाबू की कोई आवाज़ मेरे पीछे से आ रही थी। यह आवाज़ उसी दुकानदार की थी, जहाँ से मैं और मिश्रा जी और मोहल्ले के बाकी लोग समान ख़रीदा करते हैं।

मैंने मुड़ कर उनकी ओर देखा, मैं उसकी ओर बढ़ा। जैसे ही दुकान पर पहुँचा दुकानदार ने बोला श्रीकांत बाबू किसे ढूंढ रहे हैं आप। मैं इससे पहले कुछ जवाब देता, सामने से मुझे अपने सवाल का उत्तर मिल गया। दुकानदार की आवाज़ आयी। बाबू जी जिसे ढूंढ़ रहे हैं, वह मिश्रा जी अस्पताल गए हैं। मैंने आश्चर्य भरी आँखों से देखा, और उन्हीं से पूछा ! अस्पताल क्यों।

अरे ! बाबू जी यह सब मुझे नहीं पता; दुकानदार ने बोला।

फिर मैंने पूछा कौन से अस्पताल ?

फिर उसने जवाब दिया वह भी मुझे नहीं पता।

मैं उस दुकानदार को अच्छा ठीक है कह कर आगे बढ़ने लगा। तभी उस दुकानदार ने फिर से पीछे से आवाज़ देकर बोला; बाबू जी आज दूध ब्रेड़ नहीं ले जाओगे।

मैंने उसकी ओर देखकर नहीं के इशारे में सिर हिलाया।

मैं वहीं से आगे बढ़ ही रहा था और सोच रहा था क्या उनको फ़ोन करूँ वह किस हाल में होंगे। घर में सब कुशल मंगल तो होगा।

इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था। तभी अचानक सामने से उनका फ़ोन ही आ गया। मैंने फ़ोन उठाया, उनका हाल चाल लिया। उन्होंने बताया वह किस अस्पताल में है किन्तु यह नहीं बताया क्यों। मैं उनसे मिलने गया। वहाँ जा कर देखा तो अस्पताल के बाहर एक दवाइयों की दुकान से वह कुछ दवाई खरीद रहे थे। वह अपने बच्चे को उठाये हुए थे। मैं पास गया तो उनसे पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं। तब उन्होंने मुझे बताया उनकी पत्नी यहाँ इस अस्पताल में भर्ती है।

मैं उनके साथ अंदर गया उनकी पत्नी का हाल चाल लिया। तो पता चला उनका एक्सीडेंट हुआ था। वहाँ पर उनकी पत्नी के माता-पिता भी थे।

थोड़ी देर मैं वहाँ बैठा फिर मैं वहाँ से निकलने लगा तो मिश्रा जी भी अपने बच्चे को अपनी सास को देते हुए कुछ घर से सामान लेने के लिए मेरे साथ वहाँ से निकल आये।

हम लोग दोनों घर की ओर निकल पड़े।

मिश्रा जी के घर जब पहुँचे तब उन्होंने सामने की दुकान से चाय और बिस्कुट लिए और मुझे भी अपने घर बुला रहे थे, और कह रहे थे आइये श्रीकांत बाबू थोड़ा चाय शाय पी कर थोड़ा शरीर को सुस्ता ले फिर तो मुझे वहीं जाना ही है।

मेरे कई बार न न कहने के बाद वह मुझे ज़ोर देते रहे, अन्ततः मैं उनके घर गया तो देखा घर की दशा जो दुर्दशा में परिवर्तित है। मैं कमरे में घुसते ही कमरे की चौखट पर खड़ा हो गया। स्तब्ध होकर देखने लगा क्या यह वहीं घर है, जहाँ हर चीज़ व्यवस्थित रहती थी।

इतनी देर में मिश्रा जी चाय को कप में डाल कर बिस्कुट के साथ लेकर आते हुए बोले; अरे आप वहाँ क्यों रुक गए आइये। मैं अंदर आया तो देखा हर चीज़ अस्त व्यस्त पड़ी थी। तभी मिश्रा जी बोले अरे वह हमारी अर्धांगनी जी भर्ती है, तो इसी वजह से सब ऐसे ही है।

तब मैं समझ गया की मिश्रा जी कल अपने घर की तरह अस्त-व्यस्त क्यों दिख रहे थे। मेरे मन में कुछ बातें थी। सोचा न बोलूँ पर कहीं पढ़ा था सच्चा मित्र वही होता है, जो मित्र के सामने पारदर्शिता रखे। यही सोच कर मैंने बोला; मिश्रा जी बुरा न माने तो एक बात बोलूँ।

उन्होंने कहा जी बोलिये।

मैंने कहा मुझे गलत मत समझियेगा पर इंसान के शरीर का कोई भरोसा नहीं होता है। हर कोई हमेशा स्वस्थ नहीं रहता है। जब आपका हाथ टूटा था, तब आपकी पत्नी यानी के भाभी जी ने किस प्रकार न केवल आपके काम में मदद की थी, बल्कि घर और आपके बच्चे को भी सम्भाल लिया था। इतना कहने की देर थी कि अचानक मिश्रा जी की आँखें नम पड़ गयी। मैं चुप हो गया, मुझे लगा उन्हें बुरा लगा। मैंने उनसे कहा अगर आपको मेरी बातों का बुरा लगा तो मुझे माफ़ कर दीजिए।

तो इतने में उन्होंने बोला नहीं ! बुरा नही बल्कि मेरी भीतर की आँखें खोल दी आज तुमने, इसी वजह से यह ऊपर की आँखें नम पड़ गयी।

तुम सच कहते हो। मैंने वैसे भी कभी अपनी पत्नी का साथ नहीं दिया उसने हर पल हर काम में मेरा साथ दिया। मैं सोचता था कि, मैं कमाता हूँ और वह मुझ पर आश्रित है। लेकिन मेरे न रहने पर वह किसी पर आश्रित नहीं रहेगी। क्योंकि वह हर काम को सीख लेती है, पर मैं सीखना ही नहीं चाहता।

आज मुझे पता चला आश्रित कौन ? अब मैं भी हर काम सीखूँगा और आश्रित नहीं रहूँगा। मिश्रा जी की बातें सुनकर मेरे अधरों पर मुस्कान आ गयी। इसी के साथ बातों-बातों में कब हमारी चाय खत्म हुई पता ही नहीं चला। मैं खड़ा हुआ और बोला अच्छा अब मुझे आज्ञा दीजिये। ईश्वर आपके परिवार की हर समस्याओं और कष्टों को जल्दी दूर करें। मैंने उन्हें बोला नमस्कार और वहाँ से चला आया।


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