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थी एक लड़की कुछ चुलबुली सी,
बेफिक्रा दिल और हरकतों से बबली सी ,
जिंदगी से कुछ चाहिए नहीं था ,
सपने भी उसके नादान थे,
छोटी सी दुनिया ही उसकी जन्नत थी,
जब अपने और सपने दोनो मेहरबान थे।
वो कहते है न चलने का नाम है जिंदगी...
शौक से चलती रही वो वक्त के साथ,
क्या पता था जिंदगी क्या रुख लेगी एक वक्त के बाद ,
वो लड़की जो थी चुलबुली सी ...
नजर आने लगी वो कुछ बदली सी ,
अब छोटे से मन में कुछ ख्वाब आने लगे थे ...
छोटी सी जिंदगी में ही ...सपने उसे नजर बेहिसाब आने लगे थे ।
मेहनत के लिए जज्बा जाग रहा था ,
सपनों के लिए जिद और जुनून बढ़ रहा था,
इस बीच कब बचपन नौ दो ग्यारह हो गया ,
कब सोने का समय 8 से 12 हो गया... कुछ पता ही नहीं चला ।
थी जो कभी चुलबुली सी,
अब तो नजर आने लगी वह बिल्कुल बदली सी ,
अब तो किताबें उसकी दुनिया थी और सपने उसका आसमान ,
अब तो सपनों का महल था और तरह-तरह के ख्वाब उसके मेहमान ।
