सुबह की उम्मीद
सुबह की उम्मीद
सुबह की धूप जब खिड़की से आती है,
मेरी आधी नींद को प्यार से जगाती है,
नींदों से बाहर धुंधली आंखों से...
वो धूप और भी सुनहरी हो जाती है।
हाथ बढ़ाती हूं उसको छूने को,
वो उंगलियों से फिसल कर कहीं दिल में खो जाती है,
दिल में खोकर ... दिल से होकर...
फिर से नज़रों में ख्वाब भर जाती है।
खिड़की तो बस एक बहाना है...
असल में रोशनी तो अंदर से आती है,
अंदर वाली रोशनी जब सुनहरी धूप से टकराती है...
हल्की सी उम्मीद और बड़ी सी मुस्कान सपनों में एक बार फिर से भर जाती है।
