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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract

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Dr Baman Chandra Dixit

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ज़िक्र ज़ख्मों का

ज़िक्र ज़ख्मों का

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मुझे मत पूछो मेरे ज़ख्मों का,

मैं बोलूंगा क्या तुम सुनोगे क्या?

हर आवाज़ कौन सुन सका,

मैं बोल भी दूँ तो जानोगे क्या?


कुछ लुप्त हैं, कुछ गुप्त हैं

कुछ जगे हुए, कई सुप्त हैं।

कुछ निशाने आज भी धुंधले हैं

उन ज़ख्म का रक्म पूछोगे क्या?


लहू से लोहा हर ज़ख्म लेता

कभी ज़ख्म प्यासा कभी लहू प्यासा।

इलाज़ लहू की हल ढूंढ भी ले

टीस ज़ख्मों का आंक सकोगे क्या?


आग जो दहकता किसी ज़ख्म तले,

मरहम की बस का मर्ज़ वो नहीं।

यहां समंदर भी, तलाश में पानी की

बन बून्द बादल जल बरसोगे क्या?


फ़िर क्यों ये ढोंग ये दिखावा क्यों

ये फ़िक्र तेरा हर ज़िक्र पर।

नज़र रखते हो क्या समेटे ख़बरें

तेरा दिया ज़ख्म अभी ज़िंदा है क्या?



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