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Akshay Aman

Abstract Children Stories

4  

Akshay Aman

Abstract Children Stories

यादों के झरोखे...

यादों के झरोखे...

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बचपन के सुनहरे कारवाँ का किस्सा थे जो ,

हर खुशी हर गम का हिस्सा थे जो।

स्कूल के उन दोस्तों की कथा है ये,

उनसे बिछड़ जाने की व्यथा है ये।


कुछ अलग सी थी वो स्कूल जाने की चाहत,

एक दूसरे का लंच बाँट कर खाने की वो हसरत।

होमवर्क क्लासवर्क करना तो बस टीचर की डांट से बचने का था एक बहाना,

अठखेलियों और शरारतों में खोया हुआ था हर नन्हा सा दीवाना।


उन दिनों की बात ही कुछ अलग थी,

ना इतना शोर था, ना इतनी चमक थी ।

ज़िंदगी धीमी थी पर था एक मीठा सा सुकून,

लोग थे सीधे साधे पर हर में था कुछ कर दिखाने का जुनून।


टीचर की चुगली और क्रिकेट के दांव के बीच गुज़रा था हर अनमोल पल,

रंगीन यादें थी उनमे पिरोयी हुईं, सचमुच स्वर्णिम था वो कल।

पर फिर एक दिन स्कूल का सफर हो गया खत्म,

यादों और वादों के सैलाब में डूबी हुई हर एक आँख हो गयी नम।


धीरे धीरे वक़्त गुज़रता चला, एल्बम के पन्ने पलटते गए,

कारवाँ बढ़ता चला, वादे बिखरते गए।

ना वो स्कूल रहा, ना रहे वो हमराह,

साथ जिनके कभी हर पल जीने की थी चाह।

आज वक़्त कुछ और है, है सबकुछ आसान,

फिर भी कहीं ना कहीं ज़िंदगी की रेस से परेशान है हर इंसान।

मोबाइल और सोश्ल मीडिया की चकाचौंध तो हर तरफ है छाई,

फिर भी मिटती सी जा रही है आपसी रिश्तों की गहराई।


आज भी जब याद आता है वो भोला भाला सा ज़माना,

अविरल मुस्कान लाता है हर बीता हुआ नज़राना।

वो दोस्तों की शरारतें, वो लोगों का अपनापन,

काश कोई लौटा देता वो बीता हुआ बचपन।



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