एक गुमनाम सी दास्ताँ
एक गुमनाम सी दास्ताँ
इंसानी सैलाब मे बूँद भर हरियाली समेटी सी,
पत्तों की सरसराहट से कमरे को संजीदा करती हुईं,
डेस्क के कोने में छुपी हुईं सहमी सी,
ये दास्ताँ है हम दो गुमनाम पौधों की ।
दिन हमारा अत्यंत है सरल,
नौ से पाँच के भागदौड़ के मध्य भी हम रहते अचल,
शाम ढलते ही लोग तो अपने घरों को निकल जाते हैं,
बस प्रहरी की तरह हमें पीछे अकेला छोड़ जाते हैं ।
हर रात जब दस्तक देती है खामोशी,
सच पूछो तो अंधेरे में हमें भी होती है घबराहट,
एक दूजे के साथ धीमी धीमी सांसें लेते हुए,
बस वक़्त काटने की रह जाती है हसरत।
माली हमारा अक्सर दिखता गंभीर,
बाजारी उतार-चढ़ाव में लिपटी है उसकी तक़दीर,
जी करता कभी दो शब्द बातें कर के हो लें रुख़सत,
पर फाइलों के बोझ और फोन की घण्टियों के बीच कहाँ उसे है फुर्सत।
ये चार दीवारियाँ ही हमारा दस्तूर हैं शायद,
आने जाने का सिलसिला तो यूँ ही चलता रहेगा,
बिना किसी शिकन के मुस्कुराहट बिखेरनी है परस्पर,
कुछ ना सही तो एक दूजे का सहारा तो रहेगा।
