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Dipak Kumar "Girja"

Tragedy

4  

Dipak Kumar "Girja"

Tragedy

यादें

यादें

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4

अश्कों के बहते धारे

कहते हैं ज़ख्म सारे

ग़म ए दरिया सामने है

दिखते नहीं किनारे

अश्को के बहते …


सब कुछ लुटा हमारा

आँखों के सामने

आगे न आया

कोई

मेरा हाथ थामने

अपना था समझा जिनको

वो न हुए हमारे

अश्को के बहते …


हमने है देखी अपने

अरमानो की चिताएं

दिल किस क़दर जला है

भला कैसे हम बताए

ख़ुशी हम भला क्या जाने

नाते, ग़मो से सारे

अश्को के बहते …


पहलू में जाते किसके

फरियाद ही क्या करते

ग़म ही था अपना साथी

किसे याद और करते

जब बुझ गए हो अपने

उम्मीद के सितारे

अश्को के बहते …


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