STORYMIRROR

Dipak Kumar "Girja"

Abstract

4  

Dipak Kumar "Girja"

Abstract

बेवफ़ाई

बेवफ़ाई

1 min
21

दो चार क़दम चलते है यहाँ, फिर राहों में खो जाते है

कहते हैं हम अपना जिसको, अक्सर वो दगा दे जाते है

दो चार क़दम चलते यहाँ———————–


हम जिसके लिए, सपनो को संजोये सपनो में खो जाते है

मंज़िल की तरफ चलते -चलते, चेहरे धुंधले हो जाते है

दो चार क़दम चलते है यहाँ———————-


तनहा रहकर चलना लेकिन, उम्मीद यहाँ पर मत करना

पी लेना ज़हर मर जाना पर, इश्क़ के आग में मत जलना

घर जिसका बनआगे दिल में, अक्सर वो घर को जलाते है

दो चार क़दम चलते है यहाँ———————-


जब दिल टूटा तब जाना ये, आसान नहीं ग़म को सहना

आसान यहाँ दिल को देना, मुश्किल है दिल में बने रहना

इश्क़ के तुफानो में अक्सर, आशिक़ के दिए बुझ जाते है

दो चार क़दम चलते है यहाँ————————


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract