Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Ramanpreet -

Abstract


5.0  

Ramanpreet -

Abstract


वक़्त

वक़्त

1 min 110 1 min 110

वक़्त की कगार पर

हर कोई परखा जाता है

फिर भी कहाँ वक़्त से पहले

कोई वक़्त की चाल समझ पाता है


ये वक़्त ही तो है जो

अपनों और बैगानों की पहचान कराता है

वक़्त की कद्र ज़रूरी है

वरना हर वक़्त मजबुरी बन जाता है

और हद से गुज़रे दर्द जो

तो बस वक़्त ही उसका मरहम बन पाता है


सच है यारों वक़्त का खेल निराला है

राजा और रंक का स्थान पल भर में बदल जाता है

वक़्त जो खुशियों से भरा हो तो

वो यादगार बन जाता है


लेकिन आज उन खुशिओं को जीने का 

कहाँ कोई वक़्त निकाल पाता है।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Ramanpreet -

Similar hindi poem from Abstract