वक्त...
वक्त...
वक्त वक्त की बात है
कभी ग़म तो कहीं खुशियों की बरसात
कहीं है मृत्यु कही जन्म का उत्सव
किसी को राज गद्दी कहीं भूख से त्राही
कहीं लहलहाते खेत हैं दिखते
कहीं बंजर भूमि देखे आंखों से पानी बरसे
कहीं पैसों की बेशुमार बरसात है
कहीं दो वक्त को रोटी के लिए कोई लाचार है
वक्त से पहले किसी को कब मिला है
वक्त की ही शय है, वक्त की है मात।
