Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Prabhat Gupta

Romance


4.3  

Prabhat Gupta

Romance


वजूद

वजूद

1 min 802 1 min 802

मेरे वजूद का और कोई इम्तिहान क्या लोगे,

जिन लबों पे मेरा नाम आया, वो निगाहें मुस्कुरा दी।


मैं रहूं या न रहूं, मेरी मौजूदगी हमेशा रहेगी,

पूछो उनसे जिसने ज़रा सी आहट पे पलकें बिछा दी।


यूं मेरी हस्ती को मिटा न पाओगे तुम कभी,

खामाखां ही तुमने मेरी सारी चिट्ठियाँ जला दी।


डूब के हर शब, रोज़ ही उभरा है 'प्रभात',

क्या हुआ जो तुमने तमाम रौशनियाँ बुझा दी।





Rate this content
Log in

More hindi poem from Prabhat Gupta

Similar hindi poem from Romance