विपरित पड़ा परिवार
विपरित पड़ा परिवार
भावनाओं के बहाव मे विपरित पड़ा एक वो परिवार,
कैसे होगा विश्वास जिसने खोया कल अनमोल रत्न।
निः सन्देह कर रहा जहाँ निहित नहीं हैं जो परिवार,
कैसे फिर से मिलेगा उसे खोया जो उसने बालक।
विकसित कहाँ होगा विकल्प जिसका हो परिवार,
माँ का आँचल हृदय का जो निहितार्थ हो गया।
कैसे सम्भालेगा ख़ुद को वो बिछुड़ गया जो परिवार,
नन्हा सा बालक आज असमंजस छोड़ चला गया।
