Shubhi Saxena
Abstract
संसार के सबसे मूर्ख विद्यार्थी
तुम्हें प्रेम की कक्षा में मिलेंगे,
जिसकी गुरु होगी प्रकृति,
नदियां झरने हवाएं बारिशें
जिसका सबसे उद्दंड बालक
उनका ईश्वर ही होगा,
जिसे अवकाश ना जन्म से पहले
ना मृत्यु के बाद मिला होगा।
विद्यार्थी
पतझड़ में झड़ गए पत्ते सारे सूखी शाख पर लगी है आग। पतझड़ में झड़ गए पत्ते सारे सूखी शाख पर लगी है आग।
हौसलों की उड़ान में,इरादों को मकसद बनाकर तो देखो। प्रगति पथ पर तुम, हिम्मत से कदम उठाकर तो देखो। ... हौसलों की उड़ान में,इरादों को मकसद बनाकर तो देखो। प्रगति पथ पर तुम, हिम्मत से ...
नरान्तक और बिन्दुमती ने स्वर्ग की गति थी पाई। नरान्तक और बिन्दुमती ने स्वर्ग की गति थी पाई।
गिली मिट्टी की खुशबू भी इस धरा से आती है अपने बच्चों को खुश देखकर भारत माता मुस्काती है गिली मिट्टी की खुशबू भी इस धरा से आती है अपने बच्चों को खुश देखकर भारत माता मुस...
मैं और कुछ नहीं जानती बस इतना जानती हूँ कि उसने प्रेम किया था। मैं और कुछ नहीं जानती बस इतना जानती हूँ कि उसने प्रेम किया था।
किसने आपको हक दिया है कुछ भी कह लेने का किसने आपको हक दिया है कुछ भी कह लेने का
क्यों की न हम कभी सृष्टि को कुछ दे पाये हैं, और न कभी कुछ दे पायेंगे और न कभी कुछ दे पायेंगे ! क्यों की न हम कभी सृष्टि को कुछ दे पाये हैं, और न कभी कुछ दे पायेंगे और न कभी...
डरना छोड़ो अब हौसला भरो, लड़ो, कब तक मुँह चुराओगे। डरना छोड़ो अब हौसला भरो, लड़ो, कब तक मुँह चुराओगे।
क्या भूल गए आप हमारे लल्ला पे हुआ जो दानव प्रहार। क्या भूल गए आप हमारे लल्ला पे हुआ जो दानव प्रहार।
रिश्तों के आधार की, दरक रही है नींव। समय चक्र के खेल में, भटक गए सब जीव।। रिश्तों के आधार की, दरक रही है नींव। समय चक्र के खेल में, भटक गए सब जीव।।
हल्दीघाटी पावन धाम पे हर कोई शीश नवाता है हल्दीघाटी पावन धाम पे हर कोई शीश नवाता है
लेकिन मेरा यकीं करो, मैंने सुनी है चीख उन पंछियों की जिनके पर कतर दिए गए : लेकिन मेरा यकीं करो, मैंने सुनी है चीख उन पंछियों की जिनके पर कतर दिए गए :
ए `प्राण` बुढापे का निरादर नहीं करना इक रोज़ हरिक शख्स को आता है बुढ़ापा। ए `प्राण` बुढापे का निरादर नहीं करना इक रोज़ हरिक शख्स को आता है बुढ़ापा।
इस समय त्योहारों का मौसम चल रहा है पर साथ ही लोकतंत्र का भी। इस समय त्योहारों का मौसम चल रहा है पर साथ ही लोकतंत्र का भी।
बल्कि जमाने के साथ, एक दिन खुद बदल जाओगे। बल्कि जमाने के साथ, एक दिन खुद बदल जाओगे।
ममता कातर गाय दिखा गयी एक राह रथ के आगे खड़ी हो बता गयी थी चाह ममता कातर गाय दिखा गयी एक राह रथ के आगे खड़ी हो बता गयी थी चाह
जिन्हें जेलों में होने था, देश के ठेकेदार वो बन बैठे है जिन्हें जेलों में होने था, देश के ठेकेदार वो बन बैठे है
बूढ़ी मां... जिसने शायद कुछ सालों पहले खाना पकाना छोड़ दिया था वह पकवान बनाती है बूढ़ी मां... जिसने शायद कुछ सालों पहले खाना पकाना छोड़ दिया था वह पकवान बनाती है
मैं कहाँ ले जाऊँ मन मेरा... तुझसे बिछड़ने को तैयार नही... मैं कहाँ ले जाऊँ मन मेरा... तुझसे बिछड़ने को तैयार नही...
ममता की प्रतिमूर्ति ऐसी, देवी छोटी पड़ जाती है, धरती पे माँ कहलाती है। ममता की प्रतिमूर्ति ऐसी, देवी छोटी पड़ जाती है, धरती पे माँ कहलाती है।