विध्वंस
विध्वंस
विध्वंस.. विध्वंस कहाँ होता है
वो तो होता है मौन हाहाकार
उन घरों का
जहाँ कुछ दिन पहले तक बसा था
जीवन का स्पंदन
जीवित रहने का अधिकार
अब वहां दबे हुए मलबों में
सर्वत्र पसरा पड़ा है
विनाश का निस्तब्ध कोलाहल
निर्जीव देहों का ढेर और
मृतप्रायः जीवन का करुण क्रन्दन
प्रकृति के ये क्रूर उपहास कितनी
सहजता से ये जता जाते हैं कि
कितना अकिंचन है मनुष्य
असल में पूर्णतः शक्तिहीन पूर्णतः अबोध
अपने जीवन पर उसका अधिकार कहाँ ?
अपनी मृत्यु पर भी
उसका अधिकार नहीं !!
