उम्मीद
उम्मीद
समेटने की कोशिश में, खुशियां और बिखरती चली गयीं।
बनाये रखने की कोशिश में, रिश्ते और बिगड़ते चले गये।
थोड़ी और संवेदना उनको मिल जाती।
हमारी संवेदना ही कुछ कम हो पाती।
गर ऐसा हो पाता, तो बात कुछ बन ही जाती।
संवेदना कुछ कम हो तो वैसे भी,
बिगड़ने या फिर बिखरने का दर्द जरा कम होता है।
अब कहाँ तक कोशिश करे कोई बनाने या फिर समेटने का
प्रयासों का भी तो आखिर अपना कोई दम होता है।
अपनों को आजमाने का,ना जाने कैसा ये सलीका है।
बात-बात रूठने वालों को मनाने का अहसास किए जा रही थी।
बारिश के मौसम की ये धूप बहुत तीखी हुई जा रही थी।
पसीने और बारिश की कीचड, अब लथ-पथ किये जा रही है।
हमारी छतरी जो ठहरी, बरसों बरस की पुरानी
ना धूप ही रुके इससे ना कोई बारिश का पानी
इस वक़्त तो लगता है कि क्या कुछ कर गुजरें
जिससे ठहर जाय ये झमाझम बारिश का पानी
या रुके इस तपते सूरज की तपिश।
हमारी छतरी के सुराख़ कुछ भर पायें।
या बारिश की लहर कुछ थम जाये।
तेरे होने - ना होने से गर हमको कोई फर्क ही ना पड़ेगा।
सुख या तेरे बिन तड़पते रहे हम
जब हमें अपने किस्मत के भरोसे ही रहना।
हम अपने समय को गवायें,
हम भी अपनी मिटटी का वजन ढ़ो ही लेंगे।
अपनी नैया का पतवार हम ही बन लेंगे।
कर सकता है कुछ तो बस, हमारा एक काम कर देना
अपने भक्तों /बन्दों को दो-दो आँख - कान
और साथ में कुछ बुद्धि भी दे देना
अंधभक्ति से तेरी जो इनकी मुक्ति हो जाये
तो ये दुनिया सारी खुद ब खुद ही बदल जाये
बिखरी हुई खुशियां भी तब शायद पास सिमट आ जायें
रिश्तों की दरार भी तब शायद कुछ पट ही जाये
कोपलें इंसानियत की फूटें हर नई शाख से तब तो
फले - फूले जहाँ का ये कारोबार भी तब तो।
समेटने की कोशिश में, खुशियां और बिखरती चली गयीं
बनाये रखने की कोशिश में, रिश्ते और बिगड़ते चले गये।
