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Dr. Akansha Rupa chachra

Abstract

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Dr. Akansha Rupa chachra

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*तुम क्या हो मेरे लिये* बचपन

*तुम क्या हो मेरे लिये* बचपन

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बचपन की कोमलता और

चेहरे पे मासूमियत झलकती है।

न कोई चिंता न कोई परेशानी

चेहरे पर तेजस्व झलकता है।

सच कहे तो आप आकर्षण

अपने परिवार को करते हैं ।

उस समय भी बहुत लोग

तुम पर फ़िदा होते होंगे।।


रखा होगा कदम जब तुमने

जवानी की देहरी पर।

उस वक्त तुम खिलता

हुआ गुलाब दिखती होगी।

और अपनी सुंदरता के कारण

आकर्षण का केंद्र रही होगी।

देखकर तुम्हें तुम्हारी सहेलियाँ

भी उस समय जलती होंगी।।


उम्र के इस पड़ाव पर भी

कमल जैसी खिल रही हो।

और खुद ही एक स्मारक

खूब सूरती से बना रही हो।

देखकर तुम्हारा यौवन

अच्छे अच्छे पिघल रहे है।

खुश नसीब है वो माली

जिसने तुम्हें खिलाया है।।


कुछ तो तुम्हारे दिलमें

आजकल चल रहा है।

देख युवा दिल को

दिल तेजी से धड़कता है।

मन में अजब सी कंपन

तुम्हारे दिलमें हो रही है।

उधर वो तड़प रहे है

इधर तुम भी तड़प रही हो।।


दिलकी पीड़ा अब

सही नहीं जा रही।

और मन से बात भी

कही नहीं जा रही है।

लाख पूछने पर भी

दोस्त से कही न जाए।

और खुदके दर्द से क्यों

अपनो को दुखी किया जाये।। 


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