तुम ही बदल दो
तुम ही बदल दो
तुम ही बदल दो मुकाम मेरी जिंदगी का
की बहुत कड़वा है हर शाम ज़िंदगी का।
ज़हर है या अमृत है जो है इस दिल का दर्द
की मुझे समझ नहीं आता अंजाम ज़िंदगी का।
चलता रहता है फूल समझकर काँटों पर
की इन राहों पर ही है हर शैतान ज़िंदगी का।
मुक़्क़मल ख्याल कभी हो नहीं पाते बेचैनियों से
की अब तड़पना तरसना जैसा ही है हालत ज़िंदगी का।
तुम ही बदल दो मुकाम मेरी जिंदगी का
की बहुत कड़वा है हर शाम ज़िंदगी का।
