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Manoj Joshi

Abstract

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Manoj Joshi

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तशरीफ़

तशरीफ़

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वोह लाए तशरीफ़ हमारे गुज़ारिश पर

हम हुए तस्वीर अंजाम-ए-ख़्वाईश पर


तशरीफ़ आवरी से हरकत-ए-नज़र ज़माना

ख़ुशी थी बेबाक़ उनकी आज़माइश पर


तशरीफ़ रखते ही बहका जुनून-ए-ज़माना

साक़ी या जाम उलझे इसी गुंजाइश पर


आशियने में तशरीफ़ों का दौर बन गया

खुश थी क़िस्मत इस दिल-ए-आतिश पर


तशरीफ़-ए-अंजाम थी बाद-ए-सबा गवाह

आलम सरोकार थी उनकी ख़्वाहिश पर


हरकत-ए-जुनून पर नज़र-नजारा क़ुर्बान

हम तशरीफ़ हुए उनकी गुज़ारिश पर


ग़ज़ल तारीख़ बनी गूंज उठी मुशायरों में

अलग, वो तशरीफ़ रहे इसी ख्वाहिश पर।


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