त्रासदी
त्रासदी
निकले थे पुण्य कमाने
मोक्ष प्राप्ति की थी धुन सवार
रख दी दुनिया के आगे
वाह वाही की एक वजह
पर यह ख़याल नहीं फटका पास
कि करुणा के आयाम
जाने अनजाने हम से ही होते
हैं शुरू, हमीं पर आ टिकते हैं
अपनी स॔तुष्टि के लिए
अपने अंतर्मन की शांति के लिए
जोड़े सामान सभी
करी तैयारी परलोक की
दिए दिल को प्रलोभन कई
सोचा नहीं पल भर भी
क्या हम ही बन गए हैं
वजह किसी की मौत का
हर सुबह दिखती है मुझको
अपनी आखों के आगे प्रत्यक्ष
कबूतरों की एक टोली
जो दाना चुगने आती हैं
उस जगह पर जहां पहुंचने
के लिए करना पड़ता हैं
बिजली के एक बड़े से
ट्रांसफार्मर को पार
हर दिन, हर दिन,
नादान वह प॔छी
देते हैं आह्वान मौत को
उड़ते हैंं बस गिरने को
दाना है पुकारता,
टोली भी जब हो साथ-
उड़ना तो है फ़ितरत उनकी
फिर डर कैसा?
और आखिर इन्सान भी तो है
अपना दोस्त, कितना स॔वेदनशील-
प्यार और शिद्दत से वह डाले दाना
फिर डर कैसा?
हर दिन,हर दिन, ट्रांसफार्मर
के सौ सौ तार,दे कर झटका
कर देते हैं मौत के हवाले
उन बेबस ,मूक प॔छियों को
करुणामय,संवेदनशील
इन्सानों की है यह दास्तां
जिनके पुण्य और मोक्ष की
भर गई देखिए झोली।।।
