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Gautam Govind

Inspirational

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Gautam Govind

Inspirational

थाह जीवन का...

थाह जीवन का...

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बेसुध, विकल खोये हो क्यों नवल वेदनाओं में।

टोह रहे हो थाह जीवन का, बैठ निरव निभृत कोने में।

हो खामोश, शायद गुम हो, उदासी के घने बियेबानों में।

सोच रहे हो, क्या खोया - पाया क्या, जिवन के उद्यानों में।

बेसुध, विकल खोये हो क्यों.....१


फन निकाले खड़े यहां है, अपने ही आस्तीनों में।

तिरिस्कार होती हैं विवशता, बस पौने दामों में।

हितसाधन का प्रहसन्न होता, अभिजातों के बैठक खानों

पड़ है कहां निर्वाह सहज, बस फैला कहर जहानों में।

बेसुध, विकल खोये हो क्यों.....२


निश्चय ही व्याकुल हो तुम, नहीं तो आंसू क्यों है नैनो में।

या ढूंढ रहे हो कुछ सवालों के जवाब, अपने ख्यालों में।

क्यों ? गूंज रही है प्रियतम का, पाजेब तुम्हारे कानों में।

कुछ तो बोलो यार, क्या रखा है मन के ओछे भावों में।

बेसुध, विकल खोये हो क्यों.....३. 


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