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Govardhan Bisen 'Gokul'

Abstract

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Govardhan Bisen 'Gokul'

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तान्हा पोला

तान्हा पोला

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(कुंडलिया छंद)


१. तान्हा पोला का स्वरूप एवं परंपरा


तान्हा पोला आ गया, हर बालक हरषाए।

काठ-बैल सज्जित करें, मन में चाव समाए॥

मन में चाव समाए, सजाते नंदी झूला।

मोती घुँघरू बाँध, न कोई पूजन भूला॥

कह 'गोकुल' कविराय, विदर्भ बीच रस घोला।

घर-घर घूमें बाल, मनाते तान्हा पोला॥


२. पूजन, बोजारा और उत्सव का आनंद


तान्हा पोला शाम को, सजे गली-चौपाल।

तोरण बाँधे प्रेम से, पूजें नंदी बाल॥

पूजें नंदी बाल, बटे प्रसाद फिर सारा। 

घर-घर जाकर बाल, माँगते है बोजारा ॥

कह 'गोकुल' कविराय, नाम लेकर शिव भोला।

'फूटा पोला' बोल, मनाते तान्हा पोला॥


३. उपसंहार एवं सांस्कृतिक संस्कार


तान्हा पोला पर्व यह, देता सुंदर सीख।

कृषि-संस्कृति के बीज की, मन में रोपे लीख॥

मन में रोपे लीख, सीख पशु-सेवा पावें।

धरती और किसान, मान उर बीच बसावें॥

कह 'गोकुल' कविराय, नन्हें हाथों रस घोला।

पीढ़ी दर यह शान, रहे नित तान्हा पोला॥


डॉ. गोवर्धन बिसेन 'गोकुल'

गोंदिया (महाराष्ट्र)

दि. ११ सितंबर २०२६


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