STORYMIRROR

ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

Abstract

स्त्री और पुरुष

स्त्री और पुरुष

1 min
328


लानत है

मेरे पुरुष होंने पर 

और उसके स्त्री होने पर ..!


मेरे और उसके बीच

गलतफहमियों के होने पर

कहासुनी हो के रूठने पर 

अपनी ही सिसकियों में 

चुप चाप दम घोंटते रहने पर ...!


किसी सुबह मुस्कुराती 

गुड मॉर्निंग 

तक न होने पर..! 


गुड नाईट के 

उस आखिरी 

इंतजार पर ..!


सोने और 

जागने के पहले की 

बेहिसाब उलझनों पर ...!


स्त्री और पुरूष की 

खामोशियों के पीछे

परे परे चल रहे शोर पर..!


उस चीख पर..!

जिसे वे दोनों छिपाते रहे 

तमाम उम्र एक दूसरे से 


दो लोग 

दो जिंदगी को 

दो अलग अलग 

नजरिये से जी रहे है 


वह स्त्री है इस हठ में जी रही है 

मैं पुरुष हूँ इस मर्यादा में जी रहा हूँ ....!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract