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Aarti Ayachit

Abstract

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Aarti Ayachit

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सिसकियां

सिसकियां

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जिंदगी की रेखाओं में उलझी 

सिसकियों का मोल नहीं

वह अदृश्य ही रहती हैं।


इनकी आहट को संवेदना

से सींचते हुए खामोशियों की

पहचान बनाना भी जरूरी है।


वे लोग कैसे जानेंगे जो

इंसानियत के पुतले बनकर

सिसकियों को नाटक कहते हैं।


समाज में झूठी कुरितियों में

जकड़े लोग रीतियों को निभाते 

हुए अपने फर्जों की इतिश्री करते हैं।


ऐसे लोगों से करती हूं निवेदन

समय की बहती धारा में कर निर्वहन

उन रोती हुई सिसकियों को कर दफन

हम हर उस शख्स का करें उत्साहवर्धन।


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