सिंधु ताई
सिंधु ताई
सिंधु से भी गहरी ममता, चट्टान सदृश संकल्प लिए,
वात्सल्य हृदय में भरा हुआ, वेदना सहे हर त्याग किए,
ऑंचल में पले कितने बच्चे, मातृत्व लुटाती थीं खुलकर,
बीता संघर्षों में जीवन, कष्टों को हंसकर पार किए।।१।।
अद्भुत इंसान छिपा तन में, महाराष्ट्र की मदर टेरेसा थी,
वात्सल्य भाव लेकर ताई, वह अनाथों की माई थी,
चिता-अग्नि पर सेंक के रोटी, थी पेट भरी अनाथों के,
दिए अनाथालय निज बेटी, नित भिक्षाटन वो करती थी।।२।।
संकीर्ण विचारों से पीड़ित, सामाजिक पाखण्ड से भी,
उद्धार स्वयं का करती थीं, आदर्श स्वरूप में उभरीं भी,
गर्भनाल निज बच्चे का भी, तोड़ना पड़ा जिसे पत्थर से,
महिला के निज जीवन में, क्या ज्यादा दुख होगा भी।।३।।
जब देख निराश्रित बच्चे को, कौंधा विचार ताई-उर में,
होंगे कितने असहाय लोग, बच्चे, महिलाएं जीवन में,
कैसे कटता होगा जीवन, परित्यक्ता और विधवाओं का,
सिलसिला चला था अंतहीन, तब्दील हुआ संस्थाओं में।।४।।
अनाथ शब्द वर्जित कर दी, परिवार बनाया उन सबको,
आसरा मिला उस घर में, परित्यक्ता और विधवाओं को,
शिक्षा-स्वास्थ्य, पालन-पोषण,भार था उनके कन्धों पर,
माॅंगने से वो शर्माती नहीं, पालन-पोषण हित बच्चों को।।५।।
राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय ताज मिला, उनको पद्मश्री मान मिला,
सब भार है अब उस कन्धे पर, जो था पहला लाल मिला,
पाणिग्रहण किया निज हाथों से, सैकड़ों बेटियां जो पाईं,
बहुओं का सुख पायी ताई, एक भरा-पूरा परिवार मिला।।६।।
