STORYMIRROR

Ajay Singla

Classics

4  

Ajay Singla

Classics

श्रीमद्भागवत -११६ ; विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म निरूपण और अजामिल का परमधाम

श्रीमद्भागवत -११६ ; विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म निरूपण और अजामिल का परमधाम

5 mins
357


शुकदेव जी कहें हे परीक्षित

यह अभिभाषण सुन यमदूतों का

भगवान के पार्षदों ने फिर

उन्हें था इस प्रकार कहा ।


पार्षद बोले हे यमदूतो

बड़े आश्चर्य और खेद की बात ये

अधर्म प्रवेश कर रहा है

धर्मज्ञों की सभा में ।


क्योंकि वहां व्यर्थ दण्ड दिया जाता

निरपराध और अदण्डनीय व्यक्ति को

प्रजा किसकी शरण में जाये जो

रक्षक ही ऐसा व्यवहार करें तो ।


शासक ही प्रजा के प्रति

विषमता का व्यवहार यदि करे

सत्पुरुष जैसा आचरण हैं करते

साधारण लोग भी वैसा ही करें ।


अपने आचरण के द्वारा सत्पुरुष

प्रमाणित कर देते जिस कर्म को

साधारण लोक उसी का अनुसरण करें

ना जानें वो धर्म और अधर्म को ।


आँख मूँद कर सत्पुरुषों पर

अज्ञानी जीव विश्वास करें ऐसे

दयालु सत्पुरुष उन्हीं जीवों से

विश्वासघात कर सकता कैसे ।


हे यमदूतो इस अजामिल ने

प्रायश्चित कर लिया सब पापों का

क्योंकि इसने विवश होकर ही सही

उच्चारण किया भगवान के नाम का ।


जिस समय नारायण नाम लिया

उच्चारण किया इन चार अक्षरों का

उतने में ही इस पापी के

समस्त पापों का प्रायश्चित हो गया ।


भगवान के नाम के उच्चारण से

मनुष्य की बुद्धि है रम जाती

भगवान के गुण, लीला और स्वरुप में

हरि की आत्मीयबुद्धि हो उसके प्रति ।


बड़े बड़े ऋषिओं ने बताये

प्रायश्चित, व्रतादि पापों के

परन्तु जड़ से शुद्धि नहीं होती

पापों की उन सब प्रायश्चितों से ।


भगवान के नामों और पदों का

उच्चारण करने से शुद्धि हो

पापों की जड़ से मनुष्य के 

और भगवान की भक्ति पाए वो ।


भगवान के गुणों का गान कराते 

भगवान के अनेकों नाम ये

और गुणों का गान करने से

चित सर्वथा शुद्ध हो जाये ।


इसीलिए हे यमदूतो

तुम अजामिल को मत ले जाओ

भगवान का नाम लिया मरते समय

पापों का प्रायश्चित कर चुका वो ।


महातमा पुरुष सभी ये जानें

भगवान नाम का जो उच्चारण करे

संकेत में या परिहास में

पाप नष्ट हो जाते उनके ।


जो मनुष्य गिरते समय या

आग में जलते समय वो

उच्चारण करे भगवान नाम का

यमयातना का पात्र ना हो वो ।


महाऋषिओं ने जो प्रायश्चित बतलाये

तपस्या, दान, जपादि जो

संदेह नहीं कि पाप नष्ट हों इनसे

मलिन ह्रदय पर शुद्ध ना हो ।


पाप से मलिन हुआ ह्रदय

शुद्ध हो जाता हरि चरणों में

अनजाने में भी लिया हो नाम हरि का

सारे पाप हैं भस्म हो जाते ।


भगवान का नाम ऐसा अमृत है

अनजाने में भी पी ले जो कोई

पीने वाले को अमर बना दे

नाम की है महिमा ऐसी ही ।


शुकदेव जी कहें, हे राजन

भागवतधर्म का पार्षदों ने

पूरा पूरा वर्णन सुना दिया

छुड़ा लिया उसे यमदूतों से ।


पार्षदों की बात को सुनकर

यमदूत यमराज के पास चले गए

ज्यों का त्यों था सुना दिया

ये सारा वृतांत तब उन्हें ।


अजामिल यमदूतों से छूटकर

निर्भय और स्वस्थ हो गया

और भगवान के पार्षदों को उसने

सिर झुकाकर था प्रणाम किया ।


सहसा ही भगवान के पार्षद

अन्तर्धान हो गए वहां से

अजामिल शुद्ध हुआ और हो गया

भक्ति का उदय उसके ह्रदय में ।


अपने पापों को याद करके वो

पश्चाताप करने लगा था

कहे कुलटा का संसर्ग कर मैंने

अबोध पत्नी का परित्याग किया था ।


अपने असहाय माँ बाप का

भी त्याग किया था मैंने

इन पापों से अवश्य ही

गिरूंगा मैं भयंकर नरकों में ।


सोचे अजामिल जो दृश्य है देखा 

क्या वो स्वपन है कोई 

अथवा ये प्रत्यक्ष अनुभव है 

जागृत अवस्था में ही ।


अभी अभी हाथ में फंदा लेकर 

जो लोग मुझे खींच रहे थे 

पृथ्वी के नीचे ले जा रहे मुझे 

वो सब अब कहाँ चले गए ।


आकर मुझे छुड़ा लिया था 

जिन चार सुंदर सिद्धों ने 

वो अत्यंत दिव्य सिद्ध भी 

न जाने कहाँ चले गए ।


यद्यपि मैं महा पापी हूँ 

इस जन्म के पापों से 

फिर भी पूर्वजन्म में मैंने 

जरूर कोई पुण्य किये होंगे ।


उन्ही पुण्यकर्मों के कारण 

इन देवताओं के दर्शन हुए मुझे 

मेरा ह्रदय आनंद से भरा 

उन चारों की ही स्मृति से ।


मैं कुलटागामी और अपवित्र हूँ 

पुण्य न किये होते जो 

अपने पूर्व जन्म में मैंने 

याद न कर पाता भगवान को ।


इन पुण्यों से मरने के समय 

उच्चारण किया भगवान के नाम का 

वैसे तो मैं महाकपटी, पापी 

ब्रह्मतेज को नष्ट करने वाला ।


भगवान का नारायण नाम ले 

कृत्तार्थ हो गया सचमुच मैं 

मन, इन्द्रीओं को वश में करके ही 

बच जाऊँगा उस नर्क से अब मैं ।


अपने को शरीर समझकर 

अज्ञानवश बड़ी कामनाएं कीं 

और अनेकों कर्म किये मैंने 

उनकी पूर्ती के लिए ही ।


इस बंधन को मन में काटकर 

हित करूंगा सब प्राणीओं का

मित्रता का व्यवहार करूं सबसे 

वासनाओं को शांत कर दूंगा ।


भगवान की माया ने स्त्री का 

रूप धारण कर फाँस लिया मुझे 

क्रीड़ा मृग की भांति ही 

नाच नचाया बहुत है उसने ।


अब मैं अपने आप को 

उस माया से मुक्त करूंगा 

परमात्मा को पहचाना मैंने 

मन को अपने शुद्ध करूंगा ।


मैं, मेरे का भाव छोड़कर 

भगवन्नाम की कीर्ति आदि में 

अपने मन को लगाकर 

चरणों में प्रभु के लग जाऊं मैं ।


शुकदेव जी कहें, हे परीक्षित 

भगवान के पार्षद महात्माओं के 

थोड़ी देर के संग से ही 

वैराग्य हुआ मन में अजामिल के ।


सारे सम्बन्ध और मोह को छोड़कर

हरिद्वार थे वो चले गए 

भगवान के मंदिर में बैठ गए 

उस देवस्थान में जाकर वे ।


योगमार्ग का आश्रय लेकर 

इन्द्रियों को विषयों से हटाकर 

मन में उनको लीन कर लिया 

मन को बुद्धि में मिलाकर ।


फिर आत्मचिंतन के द्वारा 

बुद्धि को विष्यों से पृथक कर दिया 

तथा भगवन के धाम अनुभवस्वरूप 

परब्रह्म से जोड़ दिया ।


निर्गुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर 

बुद्धि भगवान् में स्थित हो गयी जब 

पार्षद जिनको पहले देखा था 

चारों उनके सामने खड़े तब ।


अजामिल ने उन्हें नमस्कार किया 

और दर्शन पाने के बाद में 

अपना सगरीर त्याग दिया था 

गंगा तटपर उस तीर्थस्थान में ।


अजामिल ने शरीर प्राप्त किया 

तत्काल पार्षदों का भगवान के 

विमन पर आरूढ़ होकर तब 

वैकुण्ठ धाम थे वो चले गए | 


शुकदेव जी कहें, हे परीक्षित 

दासी से विहार करने के कारण 

धर्म, कर्म चौपट किया था 

पतित हो गया था अजामिल ।


नियमों से च्युत हो जाने से 

गिराया जा रहा था नरकों में 

उनसे तत्काल मुक्त हो गया 

भगवान नाम उच्चारण करने से ।


मुक्त होना चाहते हैं जो 

लोग इस संसारबंधन से 

भगवान के नाम से बढ़कर 

साधन नहीं कोई है उनके लिए ।


क्योंकि नाम का आश्रय लेने से 

मन कर्म के पचड़ों में नहीं पड़ता 

और किसी प्रायश्चित के आश्रय से वो 

सतोगुण, तनोगुण से ग्रस्त ही रहता ।


इससे उसके पापों का भी 

पूरा पूरा होता नाश ना 

अजामिल जैसा पापी तर गया 

हे परीक्षित ये नाम की महिमा ।


उस पापी ने मृत्यु के समय ही 

पुत्र के बहाने नाम उच्चारण किया 

भगवान ने उसके बदले में 

उसे अपना वैकुण्ठ धाम दिया ।


सोचो कि श्रद्धा के साथ में 

लोग जो उच्चारण करते हैं 

प्रत्यक्ष या मन में भगवान नाम का 

उनकी तो बात ही क्या है ।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics