श्रीमद्भागवत -११६ ; विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म निरूपण और अजामिल का परमधाम
श्रीमद्भागवत -११६ ; विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म निरूपण और अजामिल का परमधाम
शुकदेव जी कहें हे परीक्षित
यह अभिभाषण सुन यमदूतों का
भगवान के पार्षदों ने फिर
उन्हें था इस प्रकार कहा ।
पार्षद बोले हे यमदूतो
बड़े आश्चर्य और खेद की बात ये
अधर्म प्रवेश कर रहा है
धर्मज्ञों की सभा में ।
क्योंकि वहां व्यर्थ दण्ड दिया जाता
निरपराध और अदण्डनीय व्यक्ति को
प्रजा किसकी शरण में जाये जो
रक्षक ही ऐसा व्यवहार करें तो ।
शासक ही प्रजा के प्रति
विषमता का व्यवहार यदि करे
सत्पुरुष जैसा आचरण हैं करते
साधारण लोग भी वैसा ही करें ।
अपने आचरण के द्वारा सत्पुरुष
प्रमाणित कर देते जिस कर्म को
साधारण लोक उसी का अनुसरण करें
ना जानें वो धर्म और अधर्म को ।
आँख मूँद कर सत्पुरुषों पर
अज्ञानी जीव विश्वास करें ऐसे
दयालु सत्पुरुष उन्हीं जीवों से
विश्वासघात कर सकता कैसे ।
हे यमदूतो इस अजामिल ने
प्रायश्चित कर लिया सब पापों का
क्योंकि इसने विवश होकर ही सही
उच्चारण किया भगवान के नाम का ।
जिस समय नारायण नाम लिया
उच्चारण किया इन चार अक्षरों का
उतने में ही इस पापी के
समस्त पापों का प्रायश्चित हो गया ।
भगवान के नाम के उच्चारण से
मनुष्य की बुद्धि है रम जाती
भगवान के गुण, लीला और स्वरुप में
हरि की आत्मीयबुद्धि हो उसके प्रति ।
बड़े बड़े ऋषिओं ने बताये
प्रायश्चित, व्रतादि पापों के
परन्तु जड़ से शुद्धि नहीं होती
पापों की उन सब प्रायश्चितों से ।
भगवान के नामों और पदों का
उच्चारण करने से शुद्धि हो
पापों की जड़ से मनुष्य के
और भगवान की भक्ति पाए वो ।
भगवान के गुणों का गान कराते
भगवान के अनेकों नाम ये
और गुणों का गान करने से
चित सर्वथा शुद्ध हो जाये ।
इसीलिए हे यमदूतो
तुम अजामिल को मत ले जाओ
भगवान का नाम लिया मरते समय
पापों का प्रायश्चित कर चुका वो ।
महातमा पुरुष सभी ये जानें
भगवान नाम का जो उच्चारण करे
संकेत में या परिहास में
पाप नष्ट हो जाते उनके ।
जो मनुष्य गिरते समय या
आग में जलते समय वो
उच्चारण करे भगवान नाम का
यमयातना का पात्र ना हो वो ।
महाऋषिओं ने जो प्रायश्चित बतलाये
तपस्या, दान, जपादि जो
संदेह नहीं कि पाप नष्ट हों इनसे
मलिन ह्रदय पर शुद्ध ना हो ।
पाप से मलिन हुआ ह्रदय
शुद्ध हो जाता हरि चरणों में
अनजाने में भी लिया हो नाम हरि का
सारे पाप हैं भस्म हो जाते ।
भगवान का नाम ऐसा अमृत है
अनजाने में भी पी ले जो कोई
पीने वाले को अमर बना दे
नाम की है महिमा ऐसी ही ।
शुकदेव जी कहें, हे राजन
भागवतधर्म का पार्षदों ने
पूरा पूरा वर्णन सुना दिया
छुड़ा लिया उसे यमदूतों से ।
पार्षदों की बात को सुनकर
यमदूत यमराज के पास चले गए
ज्यों का त्यों था सुना दिया
ये सारा वृतांत तब उन्हें ।
अजामिल यमदूतों से छूटकर
निर्भय और स्वस्थ हो गया
और भगवान के पार्षदों को उसने
सिर झुकाकर था प्रणाम किया ।
सहसा ही भगवान के पार्षद
अन्तर्धान हो गए वहां से
अजामिल शुद्ध हुआ और हो गया
भक्ति का उदय उसके ह्रदय में ।
अपने पापों को याद करके वो
पश्चाताप करने लगा था
कहे कुलटा का संसर्ग कर मैंने
अबोध पत्नी का परित्याग किया था ।
अपने असहाय माँ बाप का
भी त्याग किया था मैंने
इन पापों से अवश्य ही
गिरूंगा मैं भयंकर नरकों में ।
सोचे अजामिल जो दृश्य है देखा
क्या वो स्वपन है कोई
अथवा ये प्रत्यक्ष अनुभव है
जागृत अवस्था में ही ।
अभी अभी हाथ में फंदा लेकर
जो लोग मुझे खींच रहे थे
पृथ्वी के नीचे ले जा रहे मुझे
वो सब अब कहाँ चले गए ।
आकर मुझे छुड़ा लिया था
जिन चार सुंदर सिद्धों ने
वो अत्यंत दिव्य सिद्ध भी
न जाने कहाँ चले गए ।
यद्यपि मैं महा पापी हूँ
इस जन्म के पापों से
फिर भी पूर्वजन्म में मैंने
जरूर कोई पुण्य किये होंगे ।
उन्ही पुण्यकर्मों के कारण
इन देवताओं के दर्शन हुए मुझे
मेरा ह्रदय आनंद से भरा
उन चारों की ही स्मृति से ।
मैं कुलटागामी और अपवित्र हूँ
पुण्य न किये होते जो
अपने पूर्व जन्म में मैंने
याद न कर पाता भगवान को ।
इन पुण्यों से मरने के समय
उच्चारण किया भगवान के नाम का
वैसे तो मैं महाकपटी, पापी
ब्रह्मतेज को नष्ट करने वाला ।
भगवान का नारायण नाम ले
कृत्तार्थ हो गया सचमुच मैं
मन, इन्द्रीओं को वश में करके ही
बच जाऊँगा उस नर्क से अब मैं ।
अपने को शरीर समझकर
अज्ञानवश बड़ी कामनाएं कीं
और अनेकों कर्म किये मैंने
उनकी पूर्ती के लिए ही ।
इस बंधन को मन में काटकर
हित करूंगा सब प्राणीओं का
मित्रता का व्यवहार करूं सबसे
वासनाओं को शांत कर दूंगा ।
भगवान की माया ने स्त्री का
रूप धारण कर फाँस लिया मुझे
क्रीड़ा मृग की भांति ही
नाच नचाया बहुत है उसने ।
अब मैं अपने आप को
उस माया से मुक्त करूंगा
परमात्मा को पहचाना मैंने
मन को अपने शुद्ध करूंगा ।
मैं, मेरे का भाव छोड़कर
भगवन्नाम की कीर्ति आदि में
अपने मन को लगाकर
चरणों में प्रभु के लग जाऊं मैं ।
शुकदेव जी कहें, हे परीक्षित
भगवान के पार्षद महात्माओं के
थोड़ी देर के संग से ही
वैराग्य हुआ मन में अजामिल के ।
सारे सम्बन्ध और मोह को छोड़कर
हरिद्वार थे वो चले गए
भगवान के मंदिर में बैठ गए
उस देवस्थान में जाकर वे ।
योगमार्ग का आश्रय लेकर
इन्द्रियों को विषयों से हटाकर
मन में उनको लीन कर लिया
मन को बुद्धि में मिलाकर ।
फिर आत्मचिंतन के द्वारा
बुद्धि को विष्यों से पृथक कर दिया
तथा भगवन के धाम अनुभवस्वरूप
परब्रह्म से जोड़ दिया ।
निर्गुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर
बुद्धि भगवान् में स्थित हो गयी जब
पार्षद जिनको पहले देखा था
चारों उनके सामने खड़े तब ।
अजामिल ने उन्हें नमस्कार किया
और दर्शन पाने के बाद में
अपना सगरीर त्याग दिया था
गंगा तटपर उस तीर्थस्थान में ।
अजामिल ने शरीर प्राप्त किया
तत्काल पार्षदों का भगवान के
विमन पर आरूढ़ होकर तब
वैकुण्ठ धाम थे वो चले गए |
शुकदेव जी कहें, हे परीक्षित
दासी से विहार करने के कारण
धर्म, कर्म चौपट किया था
पतित हो गया था अजामिल ।
नियमों से च्युत हो जाने से
गिराया जा रहा था नरकों में
उनसे तत्काल मुक्त हो गया
भगवान नाम उच्चारण करने से ।
मुक्त होना चाहते हैं जो
लोग इस संसारबंधन से
भगवान के नाम से बढ़कर
साधन नहीं कोई है उनके लिए ।
क्योंकि नाम का आश्रय लेने से
मन कर्म के पचड़ों में नहीं पड़ता
और किसी प्रायश्चित के आश्रय से वो
सतोगुण, तनोगुण से ग्रस्त ही रहता ।
इससे उसके पापों का भी
पूरा पूरा होता नाश ना
अजामिल जैसा पापी तर गया
हे परीक्षित ये नाम की महिमा ।
उस पापी ने मृत्यु के समय ही
पुत्र के बहाने नाम उच्चारण किया
भगवान ने उसके बदले में
उसे अपना वैकुण्ठ धाम दिया ।
सोचो कि श्रद्धा के साथ में
लोग जो उच्चारण करते हैं
प्रत्यक्ष या मन में भगवान नाम का
उनकी तो बात ही क्या है ।
