"शिव महिमा"
"शिव महिमा"
वे गले मे अपने नाग लपटे
माथे पर तीसरा नेत्र समेटे
लगाकर के अखंड समाधि
भोले बाबा कैलाश पर बैठे
सबसे पहले प्रसन्न होते
इसलिए आशुतोष कहते
गणेशजी,कार्तिकेय बेटे
पार्वती संग वे नित रहते
नन्दी की वे सवारी करते
सामंजस्य के इतने चहते
मूषक,सर्प,नंदी,सिंह,मयूर
सब ही मिलजुलकर रहते
शिव से सब उत्पन्न होते
शिव में ही सब मिल जाते
ज्ञानी इन्हें परब्रह्म कहते
भक्तों हेतु नाना रूप लेते
जो इन्हें लिंग रूप में पूजते
उनके अधूरे काम पूर्ण होते
परहित हेतु पी लिया विष,
शिवजी लेते न देते ही देते।
