STORYMIRROR

Krishna Kumar

Abstract

3  

Krishna Kumar

Abstract

सब धूप प्रेम का ढल गया

सब धूप प्रेम का ढल गया

1 min
334

धीमा दरिया हो रहा,

सब नीर रेत में खो रहा,

सब धूप प्रेम का ढल गया

अब सूर्य स्वप्न का सो रहा।


वो पूर्णिमा सी चंद्रिमा,

दो नैन थे के ज्वार थे।

हम डूबते बहते कभी,

और मग्न भी रहते कभी।


अटखेलियों के द्वार से

हम प्रेम की फुलवारियों से

आ गए बाज़ार में!

अब कोसते हैं खुद को हम

वो नैन तो पतवार थे !


बाज़ार के इस आग में,

पतवार भी वो जल गया

जो ज्वार था संभल गया

सब धूप प्रेम का ढल गया

सब धूप प्रेम का ढल गया !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract