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Amit Kumar

Abstract

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Amit Kumar

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रूप बदलते देखा है

रूप बदलते देखा है

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मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है

कभी ग़ालिब का ख़्याल बनते

कभी मीर की रुबाई बनते

कभी सुर का श्याम बनते

कभी तुलसी का राम बनते

मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है

कभी अपनी ही बेख़्याली में

ग़ुम होकर रह जाती है

कभी किसी बेगानी शादी में भी

अब्दुल्ला दीवाना बने नज़र आती है

मैंने हर ऋत में इन आरज़ूओं को

अपनी हूक बदलते देखा है


मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है

कभी ग़ालिब का ख़्याल बनते

कभी मीर की रुबाई बनते

कभी सुर का श्याम बनते

कभी तुलसी का राम बनते

मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है

यही वो शै है जिसकी चाह में

मीरा ने मोहन को पा लिया

यही वो राह है जिसपर चलकर

देवों ने अमृत्व पा लिया

कभी किसी की उम्मीद को

इतना भी न बढ़ाओं

वो खुद से ज़्यादा

ख़ुदा की तलबग़ार हो जाये


हर वो राह मुश्किल नज़र आती है

जहाँ से कश्ती को साहिल पर

लाना और भी आसान हो जाये

जो भरता है सबकी झोली

पीरों की फकीरों की

उसकी लौं में लग जाना

सच कहूँ ग़र मानो

खुद अपनी ही मुश्किलों में

ज़िन्दगी तुझे जीना

समंदर किनारे बने घरोंदों सा

कुछ सामान हो जाये

ऐसी ही कई शक्लों को

ऐ वक़्त तेरी आंधी में

होते हुए हमने बियाबान

सा देखा है

मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है

कभी ग़ालिब का ख़्याल बनते

कभी मीर की रुबाई बनते

कभी सुर का श्याम बनते

कभी तुलसी का राम बनते

मैंने तमन्नाओं को भी

रूप बदलते देखा है..



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