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RASHI SRIVASTAVA

Abstract

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RASHI SRIVASTAVA

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ऋतु परिवर्तन

ऋतु परिवर्तन

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सर्दी की ऋतु में सूरज की, तपिश मंद पड़ जाती है 

पीली पत्तियां वृक्षों से, पुराने वस्त्रों जैसी झड़ जाती है 


गर्मी की ऋतु में पेड़ों पर, हरे पत्ते लहराते हैं

मंद मंद हवा के झोंके, मन को बहुत ही भाते है 


बसंत ऋतु में फल फूलों से, ये धरती सज जाती है

हरियाली से पूर्ण तभी तो, ये ऋतुराज कहलाती है 


वर्षा ऋतु के जल से सबको, एक जीवन सा मिलता है

फसलें लहराने लगती हैं, हरियाली को बल मिलता है


सोचो गर ऋतुऐँ ना होती, जीवन कितना नीरस होता

एकरसता से मन भर जाता, कहीं ना परिवर्तन होता 


ऋतु परिवर्तन से ही धरती, नित नए रुप बदलती है 

कभी विरानी, मस्त पवन, कभी एक दुल्हन सी लगती है।


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