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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Comedy Classics Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Comedy Classics Inspirational

रहस्यमयी परदा

रहस्यमयी परदा

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झूठ फरेब का रहस्यमयी परदा उठने लगा है

सत्य का सूरज असत्य को चीर उगने लगा है 


सियारों के मुख पर पड़े नकाब फटने लगे हैं 

इन धूर्तों का कुत्सित रूप अब दिखने लगा है 


नैतिकता के चोले में जो तपस्वी से दिख रहे थे 

उनका राक्षसी चेहरा जनता को डराने लगा है 


झूठी कसमें खा खाकर सत्ता तक वे पहुंच गए 

"कट्टर ईमानदारों" से अब मोह भंग होने लगा है 


करोड़ों के पर्दों में रहने लगा है अब आम आदमी 

"जनता दरबार" अब शीशमहल में लगने लगा है 


जनता से पूछ पूछकर काम करने की बात करते थे 

एक चैनल के खुलासे से उनका रंग बदलने लगा है 


ज्यादा पढे लिखे शासक चुनने के भी दुष्परिणाम हैं 

जनता को "चूना" लगाने में ही इनका कौशल लगा है 


कब तक मूर्ख बनोगे, अब तो संभल जाओ यारो 

किसी और ने नहीं कट्टर ईमानदारों ने तुमको ठगा है।


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