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DARSHITA SHAH

Abstract

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DARSHITA SHAH

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रात

रात

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रात को सुलाना है

चाँद को रुलाना हैl


दिल में जो बसी है वो

याद को भुलाना हैl


रोज रोज आते हुए

ख्वाब को जुलाना हैl


कस्मो और वादों की

बात को भुलाना हैl


मगरूर भरी हुई उन

आँख को झुकाना है।


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