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Mayank Kumar

Abstract

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Mayank Kumar

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राही संग

राही संग

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समय की यात्रा सुखद रही

बिना किसी उड़ान के साथ

मन की व्यथा कचोटती रही

एक राही के प्यार के साथ


मैंने तो बस प्यार किया

बिना किसी स्वार्थ के साथ

फिर भी उसने दुआ किया

मुझे समय से भूल जाने के साथ


मैंने तो बस कर्तव्य निभाया

बिना किसी चाहत के साथ

फिर भी उसने मुंह फेर लिया

बिना कोई संदेश के साथ


चलो यात्रा सुखद रही

बिना कोई उलझन के साथ

अब न हेलो , बाए का फिक्र

सोशल मीडिया में एक्टिव रहने के साथ


अब न चौराहे पर मारधाड़ का फिक्र

उसके पुराने अजनबी प्रेमियों के साथ

अब न त्यौहार में जाने का फिक्र

उसके उपस्थिति दर्ज कराने के साथ !


अब न काला पानी का फिक्र

उसके अंग्रेजी रूमानियत के साथ

अब मेरी भी हिंदी आजाद हो गई

उससे हाथ धोने के साथ !


अब उसने छोड़ा मेरे जीवन को

बिना कोई काल्पनिक संदेह के साथ

मैं भी देखता रह गया . .

बिना किसी आवेश के साथ ! !


समय की यात्रा सुखद रही

बिना किसी उड़ान के साथ ।



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