पूजनीय
पूजनीय
ना पद की मन में अभिलाषा,
ना पथ पर कभी निराशा।
स्वप्न स्वराज का करना पूरा,
जो लगता अभी अधूरा।।
बाबू जी का मन चिंतित था,
अपनों से भय किंचित था।
श्याह अँधेरी मिट जाएगी,
किरण भोर दिख जाएगी।१।
बाबू करके जतन घनेरे,
मां को अपनी छुड़वाए।
राष्ट्रपति पद शोभित करके,
प्रथम नागरिक कहलाए।।
बदन गठीला कद गर्वीला,
भाषण रहता जोशीला।
व्योम पुंज से सदा चमकते,
दिल में तुम रहो धड़कते।२।
