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parm singh

Abstract

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parm singh

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पत्थर और मिट्टी की मोहब्बत

पत्थर और मिट्टी की मोहब्बत

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आज के जमाने में मोहब्बत को अपना रंग बदलते देखा मैंने,

एक वफादार आशिक को महबूब से बेवफाई करते देखा मैंने।

बेवफा महबूब को किसी और के कंधे पर सिर रखते देखा मैंने,

दिल टूटे आशिक को किसी और का कंधा ढूँढते हुए देखा है मैंने।

वफा रास ना आई उस हरजाई महबूब को अपने आशिक की तो,

उस महबूब को पल पल अपने आशिक बदलते हुए देखा है मैंने।

वफा निभाई कैसे जाती है यह सबक सीखना है ऐ आशिक तुमने,

तो पत्थर और मिट्टी की मोहब्बत की महक को महसूस कर लो।

आंधी तुफान भी आ जाए पत्थर मिट्टी से जुदा होकर लुड़क जाए,

वह आखिर में समाता तो अपनी महबूब मिट्टी के आगोश में है।



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