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रंजना उपाध्याय

Abstract

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रंजना उपाध्याय

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प्रकृति प्रेम

प्रकृति प्रेम

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हर पल निखरे रूप तुम्हारा,

मानो कलरव समुद्र की तरंग।

लगती है शीश शीतल छाया,

प्रफुल्लित हृदय की किरण उमंग।


पल -पल तेरा प्रेम निराला,

मैं निश्छल प्रेम न कर पाया।

उसने ही है मुझे सम्भाला,

ईश्वर महिमा कौन जान पाया।


समय -समय पर आती हैं ऋतुयें,

दिव्य दृश्य की छटा दिखाती।

बगिया फल फ़ूलों से सज जाती है

भँवरे फ़ूलों पर इठलाते हैं।


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