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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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प्रिय दादाजी की स्मृति

प्रिय दादाजी की स्मृति

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वो याद आते ही चेहरा हमारा उतर जाता है

हंसता खेलता दिल मेरा रोने लग जाता है

कोई चेहरा था दिल के मेरे इतना क़रीब की,

वो ज़ेहन में आते ही आंसू तर तर टपक जाता है।


उनकी तस्वीर पर हार क्या चढ़ गया है

दिल मेरा धुंआ धुंआ सा हो गया है

वो चेहरा हमें रूह तक रुला जाता है

वो याद आते ही चेहरा हमारा उतर जाता है।


हंसता खेलता दिल मेरा रोने लग जाता है

एक माली जैसे देखभाल की थी उन्होंने

उनकी खुश्बू से दिल मेरा आज भी महक जाता है

मेरे प्रिय दादाजी,आपके भोलेपन के आगे।


सितारो का चमकना भी फीका पड़ जाता है

वो याद आते ही चेहरा हमारा उतर जाता है

हंसता खेलता दिल मेरा रोने लग जाता है

आपकी वो पहलेवाली पुरानी कहावतें

आज भी दिल को लगती है सच्ची बातें।


आपके नुस्खे से हर रोग का ईलाज हो जाता है

आप जो गये दुनिया छोड़कर

लगा दुनिया ही उजड़ गयी है मेरी,

आप जो गये हमसे नाता तोड़कर

आपकी यादों से कभी कभी

मेरा आंसू भी गीला हो जाता है।


आपके साथ वो मज़ाक करना

फ़िर रूठने पर 20 पैसे देना

आपके स्नेह से दिल मेरा भर आता है

अब तो बस आपकी हवा व दुआ ही साथ रहती है।


आपको याद कर रोने से मेरा मन हल्का हो जाता है

वो याद आते ही चेहरा हमारा उतर जाता है

हंसता खेलता दिल मेरा रोने लग जाता है।


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