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प्रेम की हो जैसे छुअन

प्रेम की हो जैसे छुअन

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प्रेम का मधुमास,

चल रही बासंती पवन।

स्पर्श उसका लगे जैसे,

प्यार की हो छुअन।


खिल उठी हैं मंजरी,

बह उठी तरंगिनि।

कूकती है कोयलिया,

सिहर उठा तन-मन।


गुनगुनाती धूप भी,

करती है स्पर्श ऐसे।

छुवन जैसे प्यार की,

मन को रंग रही हो जैसे।


तन-मन भीग उठा,

परस पाकर प्रेम का।

मैं मिटा ,अहम मिटा,

असर था ये छुअन का।


एक इस छुवन से,

संसार सारा खिल उठा।

गुनगुनाने लगे भंवरे,

प्रेम-पुष्प खिल उठा।


खुशियां तितलियां बन,

संतरंगी सपने दिखाने लगी।

मन की वीणा बावरी बन,

गीत प्रेम के गाने लगी।


राग-द्वेष मिट गया,

धुंध सारी छट गई।

प्रेम की इस छुअन में,

रात अंधियारी मिट गई।


दिव्यता का प्रकाश,

चहुं ओर जगमगाने लगा।

अज्ञानता का हुआ नाश,

ज्ञान-सूर्य मुस्कराने लगा।


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