पिंजरे में कैद प्राणी
पिंजरे में कैद प्राणी
भावनाओं की जगह स्वार्थ,
परमार्थ की घड़ी में अहंकार,
हम ज़िन्दगी जी रहे इस प्रकार।।
गगन में पंछी रहे उड़ रहे उन्मुक्त,
चारदीवारी में मानव पड़े गिरफ्त,
मोबाइल में जीवन हो गया सीमित।।
वक़्त से पहले मर्ज़ को दे रहे दावत,
कुंठा ग्रसित हैं मानसिकता और मन,
अरसा बीत गया देखे हुए अपना चमन।।
प्राण वायु की जगह वायु वातानुकूल,
भोजन में खाते संरक्षित डब्बो का मूल,
वय से पहले वृद्ध होने का कर रहे प्रबंध।
